Vaman Avatar Story in Hindi – विष्णु के वामन अवतार की कथा

Vaman Avatar Story in Hindi – विष्णु के वामन अवतार की कथा

एक बार की बात है जब दानवो ने अदिति के सारे देव पुत्रों को स्वर्ग से परास्त कर उनसे सारी धन-समृद्धि छीन कर बड़ा ही अपमानित किया था तब से कश्यप जी की पत्नी अदिति अपने पुत्रों की ऐसी अवस्था देख काफी दुखी रहती थी। वह कृष्ण की बड़ी तन्मयता और विधि विधान से पूजा अर्चना करती थी। उन्होंने श्री कृष्ण की पूजा एक विशेष नियम के तहत जिसे पयोव्रत कहते हैं अनुष्ठान किया। इस अनुष्ठान से श्री कृष्णा बड़े प्रसन्न हुए और अदिति के सामने प्रकट हो गए। उन्हें देख अदिति भाव विभोर हो उठी। उनकी प्रसन्नता का कोई सीमा ना रहा।

श्री कृष्णा का दर्शन पाकर वह बिल्कुल मुक हो गई और उन्हें अपने भक्त वत्सल नैनों से एकटक निहारने लगी। फिर अपने आप को संतुलित कर कृष्ण की स्तुति करने लगी। कहने लगी प्रभु ! जब आप प्रसन्न हो जाते हैं तब आप मनुष्यों की हर इच्छा पूरी करते हैं। उन्हें अतुलित धन योग की समस्त सिद्धियां ज्ञान धर्म इत्यादि सबकुछ देते हैं । फिर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना आदि छोटी -छोटी कामनाएं हैं जो आपके बाएं हाथ का खेल है ।

श्री कृष्ण अदिति की स्तुति से बहुत प्रसन्न हुए, वह तो सर्वेश्वर है, सबके हृदय की बात समझते और जानते हैं। उन्होंने कहा देवताओं की जननी अदिति तुम्हारी दिल की व्यथा और इच्छा को मैं अच्छी तरह जानता हूं। तुम चाहती हो की दानवो ने जो तुम्हारे पुत्रों के साथ अत्याचार किया है, मैं इसके लिए उन्हें सबक सिखाऊं और उन्हें उनका स्वर्ग धन यश सभी कुछ वापस दिलवाऊं। अदिति ने श्री कृष्ण की बात से सहमति जताई और इस कार्य को करने के लिए उनसे नम्र निवेदन किया।

श्रीकृष्ण ने कहा ठीक है मैं आपके कोख से आपके पुत्र के रुप में अवतार लूंगा तब इस कार्य को करूंगा। आप अपने पति में मेरा रूप देखना और उनकी सेवा टहल करना। अदिति अपने पति की निस्वार्थ भाव से सेवा करने लगी। कश्यप तो अंतर्यामी हैं वह समझ गए की कृष्ण अंश रूप में मेरे पास आ गए हैं। मुझे अदिति को देना है समय आने पर श्री कृष्ण वामन ब्राह्मण के रूप में अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए।

वामन (Vaman)ब्राह्मण की छोटी सी ऊंचाई थी। छोटे-छोटे उनके हाथ – पैर, लड्डू जैसा छोटा सा चेहरा बड़ा ही सुंदर अद्भुत छवि और आकर्षित शरीर का गठन था। सभी देवी देवता अदिति के घर उनके दर्शन के लिए आए। ऐसी अलौकिक छवि देख सभी मंत्रमुग्ध हो गए। वामन ब्रह्मचारी रूप में देख कर सभी महर्षियों को बड़ा आनंद हुआ। सभी ऋषियों ने उनका संस्कार करवाया। उपनयन संस्कार हुए। स्वयं गायत्री माता ने उन्हें गायत्री का उपदेश दिया बृहस्पति जी ने यगोपवित और उनके पिता ने मेखला इत्यादि दिए। माता अदिति ने कौपीन वस्त्र दिए। देवताओं ने उन्हें छत्र प्रदान किया, ब्रह्मा जी ने कमंडलु सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला दी, यक्षराज कुबेर ने भिक्षापात्र और मां भगवती ने उन्हें स्वयं अपने हाथों से भीक्षा दी। इस तरह वटु वेश धारी भगवान का उपनयन संस्कार हुए । इसके बाद भगवान ने स्वयं हवन किया।

नर्मदा नदी के तट पर भगवान का तेज़ इतना अधिक था कि उनके सामने भृगुवंशी सब निस्तेज हो गए। सभी विचार करने लगे कि कहीं हमारा यज्ञ देखने के लिए स्वयं सूर्य, अग्नि या सनत कुमार तो नहीं आ गए। भृगु के पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्यों के साथ मिलकर सोचने लगे। उसी समय वामन प्रभु हाथ में छत्र, दंड और जल से भरा कमंडलु लिए अश्वमेघ यज्ञ के मंडप में पहुँच गए। भगवान् के कमर में मुंज की मेखला, गले में यज्ञोपवीत, बगल में मृगचर्म और सिर पर जटा धारण किये एक बौने ब्राह्मण के रूप में राजा बलि के यज्ञ मंडप में प्रवेश किये। सभी ने उनका स्वागत किया। उनका लघु रूप बड़ा ही दर्शनीय था। उन्हें राजा बलि देख कर बड़े आनंदित हुए। उनकी मधुर वाणी के साथ पूजा अर्चना की, उनके पैर पखारे और उस जल को उनके सीर से लगाया।

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राजा बलि ने कहा आप हमारे यज्ञ में पधारे ये हमारा सौभाग्य है। आज हमारा वंश पवित्र हो गया और हमारे पितर तृप्त हो गए। आपके आने से हमारा यज्ञ सफल हो गया।ब्राह्मण कुमार आपको देखने से ऐसा जान पड़ता है कि आप मुझसे कुछ चाहते हैं। हे ब्रह्मचारी जी ! आप हमारे पूज्य हैं आप जो भी चाहे मुझसे निसंकोच बोलें मैं आपको सब कुछ दे सकता हूं।

वामन महाराज ने राजा बलि की तथा उनके वंश की खूब तारीफ की। कहा मुझे मालूम है आपके वंश परंपरा में कोई भी धैर्य ही नहीं है और ना ही कोई कंजूस है। आप के वंश में सभी दानी है तथा युद्ध में ललकारने पर अपना मुंह कायरों की तरह नहीं मोड़ते। आप के वंश में प्रहलाद ऐसे शोभायमान हो रहे हैं जैसे आकाश में चंद्रमा। हिरण्याक्ष जैसे वीर का जन्म भी आप के वंश में ही हुआ है। आप तो बड़े हैं वीर और धर्म आचरण के स्वामी है। दैत्येन्द्र आप मुंह मांगी वस्तु देने बालों में श्रेष्ठ है। मैं आपसे ज्यादा कुछ नहीं मांगता बस थोड़ी सी पृथ्वी।अपने पैरों से तीन डग मांगता हूं। माना कि आप सारे जगत के स्वामी है और बड़े और उदार है लेकिन मुझे जितनी आवश्यकता है उतना ही हमने मांग लिया है, ज़्यादा की ज़रूरत नहीं है।

राजा बलि उनकी बात सुनकर हंसने लगे कहने लगे ब्राह्मण मैं तीनों लोगों का अधिपति हूं और द्वीप-का द्वीप आपको दे सकता हूं| मुझ से मांगा भी तो 3 डग भूमि| क्या बुद्धिमानी है खैर आप जिसमें संतुष्ट हो मैं वही काम करूंगा मैंने आप की मांग सहर्ष स्वीकार कर ली है|

यह सुनकर शुक्राचार्य राजा बलि पर क्रोधित हो गए | कहने लगे यह तुमने क्या किया यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है| यह श्री कृष्ण है यह तुमसे छल से तुम्हारा सब कुछ लेने आए हैं| राजा बलि रुक जाओ अपनी बात वापस ले लो| पर राजा बलि ने अपने गुरु की एक ना सुनी और वामन भगवान ने अपने एक पद से राजा बलि की सारी पृथ्वी नाप ली और दूसरे पर से स्वर्ग नाप लिया तब बलि ने प्रभु का तीसरा पग के लिए अपना सिर आगे कर दिया और मोक्ष को प्राप्त कर वैकुंठ लोक चले गए।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की हमें अपनी चीजों पर अहंकार नहीं होना चाहिए इस कहानी में हमने देखा कि राजा बलि थोड़ी देर के लिए ही सही लेकिन अहंकारी हो गए थे दूसरी शिक्षा मिलती है कि राजा बलि कि तरह दानी होना चाहिए ।

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