Tulsi Story in Hindi – तुलसी की महिमा

Tulsi Story in Hindi – तुलसी की महिमा

हमारी भारतीय संस्कृति में ऐसे अनेक पेड़ पौधे है जिनकी पूजा हम देवताओ की तरह पूजा करते है, जैसे पीपल, बरगद, तुलसी, नीम आदि ।
इनकी मान्यताओं के दो कारण है, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन वृक्षों में औषधिये गुण होते है जो हमारे कई बिमारियों में काम आते है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ये हमारे लिए पूजनीय होते है जैसे कार्तिक महीना में तुलसी विशेष कर पूजी जाती है। हर शनिवार को पीपल की पूजा की जाती है। वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा की जाती है और शीतला माँ की पूजा में नीम के वृक्ष की पूजा की जाती है ।

तुलसी पूर्व जन्म में वृंदा नाम की लड़की थी और उसके पति का नाम जलंधर था जो शिव का अंश था। वह समुद्र से उत्पन्न हुआ था लेकिन राक्षस कुल का था। वृंदा का जन्म भी राक्षस कुल में हुआ था। वह बचपन से ही श्री विष्णु के अनन्य भक्त थी, बड़ी हुई तो इसकी शादी जलंधर से हो गयी। वृंदा बहुत ही पति व्रता स्त्री थी। अगले जन्म में जलंधर शंखचूड़ हुआ और वृंदा वापस इसकी पत्नी बनी। शंखचूड़ राक्षस जरूर था लेकिन वह बहुत ही धार्मिक विचार का था और वृंदा भी बहुत धार्मिक थी।

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शंखचूड़ दानवो का राजा था, एक बार शिवजी के साथ उसका युद्ध हुआ, वह किसी भी तरीके से पराजय नहीं हो रहा था। इसकी पत्नी वृंदा अपनी पति के जीवन के लिए विष्णु भगवान् के सामने संकल्प लेकर बैठी थी। सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास सहयता के लिए गए पर विष्णु ने कहा वृंदा के साथ में छल नहीं कर सकता। वह हमारी प्रिय भक्त है, सभी देवता कहने लगे हे प्रभु इसके सिवा और कोई दूसरा मार्ग नहीं है । केवल आप ही है जी मदद कर सकते है। विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और वृंदा के पास पहुँच गए। उसने अपने पति को देखा तो तुरतं पूजा से उठ गयी। इधर वृंदा का जैसा ही संकल्प टुटा, देवताओ ने शंखचूड़ का वध कर दिया और उसका सर जा कर वृंदा के महल में गिरा । जब उसने देखा की मेरे पति का सर तो कटा पड़ा है तो सामने फिर कौन है। उसने पुछा आप कौन हो और आप मेरे पास क्यों आये । तब भगवान् विष्णु अपने रूप में आ गये पर वह कुछ न बोल सके । वृंदा सब कुछ समज गयी और बोली हे विष्णु आप पत्थर दिल हो, आप किसी स्त्री की भावना की नहीं समझ सकते। आप आज से पाषाण हो जाओ । भगवान् ने कहा हे वृंदा शंखचूड़ को मुक्ति मिल गयी है और वह मोक्ष को प्राप्त हुआ है और मेरे अंदर ही समा गया है, दूसरी बात यह है की तुम भी मुझे पाने के लिए कई जन्मो से तपस्या कर रही थी। अब तुम्हारा स्थान मेरे ह्रदय में है, तुम जैसे ही अपना शरीर त्याग करोगी मेरे ह्रदय में समा जाओगी । मैं अगले जन्म में शिलाग्राम और तुम तुलसी हो कर इस जगत में विख्यात होंगे ।

तुलसी की महिमा

विष्णु तुलसी को अपने महल में ले गए, उनके अष्टावली नाम से पूजा किया जिससे अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

अष्टावली नाम ये है – वृंदा, वृन्दावनी, विश्वपावनी, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, नंदिनी , तुलसी और कृष्णजीवनी

इनका मंत्र है –

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दवने स्वाहा

इस मंत्र के साथ तुलसी की पूजा करने से सारि सिद्धियां निश्चित रूप से मिलती है ।

कहते है कार्तिक की पूर्णिमा में विश्वपावनि तुलसी की पूजा भक्ति भाव से करने पर मनुस्य के सारे पाप धूल जाते है और वह विष्णु लोक में जाता है । जो व्यक्ति कार्तिक महीने में विष्णु को तुलसी पत्र अर्पण करता है उसे दस हज़ार गौदान का फल मिलता है ।

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