Tenali Rama Stories – दशहरे की सबसे उत्तम झांकी

Tenali Rama Stories – दशहरे की सबसे उत्तम झांकी

महाराज कृष्णदेव राय सभी उत्सव और त्योहारों को बड़े शौक और हर्षोल्लास से मानते थे। एक बार दशहरे के अवसर पर उन्होंने अपने सभी दरबारियों से कहा की आप सभी दशहरे के उपलक्ष्य में अपनी पसंद के अनुसार झांकी बनाएं । यह झांकी दशहरे के मैदान में बनाएं । जिसकी झांकी उद्देश्यपूर्ण , सत्यता के निकट और सुंदर होगी उसे श्रेष्ठ मन जाएगा, पुरस्कार भी मिलेगा । सभी दरबारी ख़ुशी -ख़ुशी झांकी बनाने की तैयारी करने लगे । लोगों ने अच्छी झांकी बनाने के लिए महीनो पहले से तैयारी शुरू कर दी ।

इधर तेनालीरामा (Tenali Rama) को कोई चिंता नहीं । अपने घर पर खाता और चादर तान कर सो जाता। सभी दरबारी सोचते तेनालीराम को क्या हो गया ? वह अभी तक झांकी क्यों नहीं बनाना शुरू कर रहा है ? कुछ लोग ते सोच कर खुश हो रहे थे की अच्छा ही है, हमारा कोई अच्छा प्रतियोगी नहीं होगा । ऐसे करते – करते काफी दिन निकल गए । दशहरे का दिन भी निकट आ गया ।

दशहरे में जब एक दिन शेष रहा तो तेनालीराम झांकी बनाने के लिए अपने बेटे को साथ लिया दशहरे के मैदान की ओर चल दिया । अचानक तेनाली को देखकर सभी आश्चर्य हो गए । कुछ लोग कहने लगे हमने तो महीनों पहले से झांकी बनानी शुरू की थी ये एक दिन में क्या तीर मार लेगा ?

अगले दिन दशहरा का मैदान सुन्दर -सुन्दर झांकियों से सजा हुआ था । सभी झांकियां एक से बढ़कर एक सुंदर और प्रेरणादायक थीं । महाराजा कृष्णदेव राय सभी झांकियों को गौर से देख रहे थे और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे । तभी महाराज ने पूछा, तेनाली का झांकी कहाँ है ? एक दरबारी ने बताया , महाराज उनकी झांकी वो रही ऊपर टीले पर ।

महाराज अपने सैनिकों के साथ टीले पर पहुंचे तो देखा एक टूटी -फूटी झोपड़ी बनाकर उसके बाहर एक मूर्ती खड़ा करके तेनाली रामा ने झांकी बनाई है । कुछ देर तो वे झांकी में छिपे सन्देश को समझने का प्रयास करते रहे , उनके साथ आए सैनिकों को भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था । तब महाराज ने तेनालीराम से इस झांकी का सन्देश पूछा । तेनालीराम ने कहा महाराज ! इस झांकी का क्या अर्थ है, इसके बारे में यह मूर्ती खुद ही बताएगा । वहां पर उपस्थित सभी लोग सोचने लगे , तेनालीराम over confidence के कारण पगला गया है । जिसके कारण ऐसी बहकी -बहकी बातें कर रहा है । कहीं कोई मूर्ती भी बोलता है भला, जो ये बोलेगा ।

तभी मूर्ती ने बोलना शुरू किया “महाराज मैं उसी रावण की छाया हूँ जिसके मरने की ख़ुशी में आप यह उत्सव मन रहे हैं । मैं एक बार मारा था, मगर अब हर रोज जिन्दा होता हूँ। भूख में, गरीबी में , लूट-पाट में, दरिंदगी में, हर जगह मैं ही नजर आता हूँ । अब मुझे कोई नहीं मार सकता ।” यह कहकर मूर्ती जोर -जोर से हंसने लगी |

महाराज क्रोधित होकर बोले, ठहर जा दुष्ट मैं अभी तेरे टुकड़े -टुकड़े करके तुझे ज़मीन पर डाल देता हूँ । मेरे मरने से क्या भूख, गरीबी , चोरी -डकैती सब मर जाएंगे ? आपकी प्रजा के क्या सारे दुःख दूर हो जाएंगे ? यह कहकर एक बच्चा मूर्ती से बाहर निकल आया । वह तेनालीराम का पुत्र था ।

महाराज कृष्णदेव राय यह दृश्य देख कर भौंचक्के रह गए । उन्होंने झट से तेनालीराम को गले से लगा लिया और कहा तुमने मेरी आँखे खोल दी । तुम्हारी झांकी ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है । तुम्हारी झांकी के कारण ही मुझे अपनी प्रजा के कष्ट का पता चला । तुम्हारी झांकी ही सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार पाने का हक़दार है । सभी दरबारी फिर अपना सा मुंह लेकर विजेता तेनालीराम को देख रहे थे ।

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