Tenali Rama Stories in Hindi – तेनाली रामा – भैरव बूटी

Tenali Rama Stories in Hindi – तेनाली रामा – भैरव बूटी

मुस्लिम सियासत का एक सूक्का नामक पहलवान था। एक बार वह कृष्णदेव राय महाराज के विजयनगर में आ पहुंचा। वह सुबह शाम नगर के किसी मुख्य चौराहे पर खड़ा हो जाता और अपना लंगोट घुमा- घुमा कर लोगों को ललकारता और कहता है की कोई विजयनगर में ऐसा है जो सुक्का पहलवान से दो-दो हाथ करें। मेरी शर्त है कि यदि मैं जीत गया तो वह मेरी जिंदगी भर गुलामी करेगा और अगर वह जीत गया तो मैं उसकी गुलामी जिंदगी भर करूंगा। कोई है तो सामने आओ।

सुक्का पहलवान, पहलवान नहीं बल्कि हाथी था। उसके भयंकर डील-डौल और मजबूत पुट्ठे को देख कर विजय नगर के किसी पहलवान की इतनी हिम्मत नहीं कि उसकी चुनौती को स्वीकार कर सके। सुक्का पहलवान ऐसा प्रतिदिन ही करता था। उसको ऐसा करते कई दिन गुजर गए।

एक दिन यह बात कृष्णदेव राय महाराज के कानों तक पहुंची। इस बात को लेकर महाराज थोड़ा बेचैन हो गए। उन्होंने तुरंत सेनापति को बुलाकर पूछा- क्या हमारे राज्य में ऐसा कोई पहलवान नहीं जो सुक्का पहलवान का अहंकार को तोड़ सके ? राज्य के अखाड़ा में जो लाखों मुद्राएं खर्च किए जाते हैं वह सब क्या बेकार हैं ?

सेनापति सिर झुकाए हुए खड़ा था। वह बोलता भी तो क्या बोलता ? सुक्का पहलवान की ताकत वह खुद अपनी आंखों से देख चुका था की वह पक्की ईंटों को अपने दोनों हाथों से गाजर- मूली की तरह तोड़ देता था, पत्थर को नींबू की तरह अपनी मुट्ठी में मसल कर रख देता था, अपने मजबूत पुट्ठों से किसी दीवार को ठोकता तो वह दीवार धराशाई हो जाती। ऐसा बलशाली था वह सुक्का पहलवान ।

सेनापति को खामोश देख महाराज ने कहा- “यह राज्य की प्रतिष्ठा का सवाल है। फॉरेन राज दरबारियों को विचार विमर्श के लिए बुलाया जाए” इस सिलसिले में आपात बैठक बुलाई गई। मगर सुक्का की चुनौती का जवाब नहीं मिल पाया। सभी मंत्रियों ने एक स्वर में कहा, महाराज अपने राज्य में कोई ऐसा बलवान नहीं जो सुक्का पहलवान का मुकाबला कर सके।

महाराज निराश होकर बोले- “क्या हम हार मान लें। उसे दरबार में बुलाकर उपहार और सम्मान देकर विदा करें और यह कहे कि तुम जैसा कोई पहलवान हमारे राज्य में नहीं है। सारे दरबारी महाराज की बात सुनकर चुप हो गए और सिर झुका लिया। मानो उनके निर्णय पर स्वीकृति दे रहे हैं।

तभी तेनालीराम बोला- नहीं महाराज, ऐसा नहीं होगा। महाराज तेनालीराम की ओर आशा भरी निगाहों से देखा और कहा फिर उस पहलवान से कौन लड़ेगा ? “मैं लडूंगा” तेनालीराम ने अपना सीना ठोक कर कहा।

राजपुरोहित ने व्यंग करते हुए कहा, रहने दो तेनालीराम बड़े-बड़े ऊंट बह गए तो गधा कहता इतना ही पानी, यह वाली बात हो जाएगी। वह तुम्हारी चटनी बना देगा।

हां तेनालीराम यह कोई मजाक की बात नहीं है। महाराज ने कहा- वह कहां हाथी जैसा और तुम कहां दुबले पतले। कोई और उपाय सोचो ताकि अपनी इज्जत बच जाए।

और कोई उपाय नहीं है महाराज, तेनाली ने कहा। कम से कम लोग यह तो नहीं कहेंगे कि विजयनगर में सुक्का को चुनौती देने वाला कोई भी नहीं है।

तेनालीराम ने कहा, महाराज आप घोषणा करवा दें कि आज से ठीक 1 सप्ताह बाद में सुक्का से दो -दो हाथ करूँगा । महाराज को विवश होकर तेनाली रामा को स्वीकृति देनी पड़ी ।

मंत्री, सेनापति राजपुरोहित सभी फूले नहीं समा रहे थे। कह रहे थे चलो तेनालीराम ने खुद ही अपनी मौत का दावत दे दिया है ।अब तो हमारे वारे न्यारे हो जाएंगे। अब तेनाली का किस्सा तो खत्म ही समझो।

अगले दिन विजय नगर में यह समाचार फैल गया की सुक्का पहलवान की चुनौती तेनालीराम ने स्वीकार कर ली है ।जो भी सुनता चकित रह जाता ।कुछ लोग राजा को भी उल्टा सीधा बोलते कहते इस बेमेल जोड़ को उन्होंने कैसे स्वीकृति दे दी। जो तेनालीरामा के हितैषी थे उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की ।

पांचवे दिन विजय नगर में एक अफवाह और फैल गई कि तेनालीराम कृष्णा नदी के किनारे स्थित भैरव मंदिर में भैरव की कठोर साधना कर रहे हैं । यह बात सुक्का के कानों में भी गई । सुक्का ने सुन रखा था रखा था कि भैरव जिस पर प्रसन्न होते हैं उसके दुश्मनों को पाताल लोक भेज देते हैं। वह इन बातों परेशान हुआ और डर गया। उसके मन में हजारों शंकाएं घिर गए। उसने सोचा क्यों ना एक बार भैरव मंदिर जा कर देखा जाए कि यह बात सच है या नहीं ।

उसी रात सुक्का छुपते -छुपाते भैरव मंदिर जा पहुंचा। वहां जाकर उसने जो नजारा देखा, उसे देखकर उसके पसीने छूट गए। उसने देखा कि साक्षात भैरव तेनालीरामा को गोद में बिठाकर अपने हाथों से कुछ जड़ी- बूटी खिला रहे हैं और कह रहे हैं ले बेटा खा ले। यह भैरव की बूटी है। इसे खाने से तुम में ऐसी शक्ति आ जाएगी कि पहाड़ भी तेरे स्पर्श से थर-थर करने लगेगा। यदि तू किसी को ठोकर मार देगा तो वह सैकड़ों मील दूर जाकर गिरेगा।

पहलवान उल्टे पांव वापस आया और अपनी बोरिया- बिस्तर बांध कर चुपचाप विजयनगर से भाग खड़ा हुआ। महाराज ने बड़े आश्चर्य से तेनालीराम को देखा, तो उसने पूरी बात बताई और कहा महाराज यदि अपने आप से अधिक बलशाली को शिकस्त देनी हो तो ताकत से नहीं बुद्धि से काम लेना चाहिए।

महाराज ने तेलानीराम से कहा- तुम हमारे दरबार के रत्न हो, हमें तुम्हारी बुद्धि पर गर्व है ।

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