Shiv Puran Katha in Hindi – शिव को भी काशी छोड़ कर क्यों जाना पड़ा

Shiv Puran Katha in Hindi – शिव को भी काशी छोड़ कर क्यों जाना पड़ा

Shiv Puran Katha in Hindi – स्वयंभुव मन्वन्तर के मनु वंश में दिवोदास नाम का एक राजा था । वह अत्यंत दृढ संकल्पी , परम ज्ञानी , परम वीर और शिव जी का भक्त था। एक बार की बात है की उस वर्ष राजा के राज्य में वर्षा नहीं हो रही थी । राजा अपनी प्रजा की भलाई के लिए अपना राज्य छोड़ कर वन में कठिन तप करने लगा । उसके न रहने से उसके राज्य में दुःख का साम्राज्य छा गया ।

इन सारी परिस्थितियों को देवतागण भी देख रहे थे । प्रजा को व्याकुल देख ब्रह्मा अन्य देवताओं के साथ राजा के पास गए और बोले , हे राजन ! हम सभी देवता तुम्हारे कठिन तप से प्रसन्न हैं । तुम्हारी प्रजा तुम्हारे बिना व्याकुल हो रही है । तुम्हारी इच्छा ज़रूर पूरी होगी । तुम्हारे राज्य में वर्षा आवश्य होगी । तुम अब वापस लौट जाओ और अपने राज्य का कार्य भर संभालो ।

राजा ने कहा ,हे प्रभु ! मेरी एक शर्त है , आप मानेगें तभी मैं अपने राज्य वापस लौटूगां । ब्रह्मा ने कहा , कहो वत्स ! तुम्हारी क्या शर्त है ? हमें तुम्हारा शर्त आवश्य मान्य होगा । राजा ने कहा हे प्रभु ! मैं एक ही शर्त पर वापस जाऊँगा की सभी देवता आकाश मंडल में स्थित रहें , नाग आदि पाताल में निवास करें और पृथवी पर मनुष्यों के आलावा और कोई न रहे | ब्रह्मा ने एवं अस्तु कहा ।

Shiv Puran Katha in Hindi

इसप्रकार इंद्र सहित सभी देवताओं को कशी छोड़ कर जाना पड़ा । ये बात शिव तक भी पहुंची । शिव जी को तो कशी अत्यंत प्रिय था । लेकिन न चाहते हुए भी शिव जी को भी काशी तथा पृथ्वी लोक छोड़ कर जाना पड़ा ।

देवताओं को दिवोदास से बहुत गुस्सा था । वे लोग उसे हमेशा उसे पथभृष्ट करने की कोशिश करते रहते, पर सफल न हो सके |

राजा स्वयं अग्नि ,वायु , जल चन्द्रमा तथा सूर्य बनकर अपनी प्रजा को लाभ पहुंचाने लगा । जिस चीज से प्रजा का भला होता था ,वही रूप धारण कर लेता था । उसके इस पराक्रम को देख कर देवता बड़े लज्जित हुए । वह किसी भी प्राणी को दुःख नहीं देता था ।धर्म की राह पर चलता था । दुष्टों को कठोर सजा देता और युद्ध क्षेत्र में सिंह की तरह पराक्रम दिखाता था । जहां शत्रुओं को सूर्य बनकर भस्म करता था वहीँ अपने मित्रों को चन्द्रमा रूप बनकर शितलता प्रदान करता था । स्थिति ऐसी थी की जितनी सुख सुविधा स्वर्ग में नहीं था उससे कहीं ज्यादा सुख धरती पर था । राजा अपनी प्रजा का पुत्र की तरह पालन करता था । सभी देवता भी पृथ्वी पर आने को ललायित थे । विष्णु कहते मैं वृन्दावन नहीं जा सकता , ब्रह्मा प्रयाग नहीं जा सकते और शिव काशी नहीं जा सकते ।

देवताओं ने योगिनिगण की सहायता से राजा को अपने कार्य से विमुख करना चाहा पर सफलता नहीं मिली । फिर सूर्य को भेजा गया । वे बहुत कोशिश किए पर दिवोदास को धर्म पथ से विचलित न कर सके । वे भी योगिनिओ की तरह काशी में बस गए । सूर्य देव राजा से इतने प्रभावित हुए की उनके प्रजा के कष्टों को दूर करने के लिए अपने 12 रूपों में अलग -अलग नाम से प्रकट होकर उनका कष्ट निवारण किया ।

शिव उनदोनों के न लौटने पर व्यथित हो कर ब्रह्मा जी को भेजा । दिवोदास ने उनका बड़ा आवभगत किया । उसने कहा ,आपको जिस चीज की भी ज़रूरत हो ,मैं हाज़िर हूँ । वहां उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया । वे भी वहीँ बस गए । फिर गणेश को भेजा वे भी न लौटे । अब दिवोदास के नगर काशी में विष्णु आए ,वे भी उनकी आस्था और धर्म से अत्यधि प्रभावित हुए । उन्होंने राजा को जन्म – मरण के चक्र से मुक्त होने का रास्ता प्रदान किया । विष्णु ने स्वयं राजा के शरीर को स्पर्श किया और उन्हें मोक्ष प्रदान किया । काशी में जिस शिव लिंग की स्थापना दिवोदास ने की थी वह दिवोदासेश्वर के नाम से प्रसिद्द है ।

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