Shiv Parvati Story in Hindi – शिव पार्वती की शादी के अद्भुत दृश्य

Shiv Parvati Story in Hindi – शिव पार्वती की शादी के अद्भुत दृश्य

शिव (shiv)जूट जटाधारी गले में सर्पों की माला और त्रिपुंड धारी है। संसार के कल्याण हेतु तथा अपने भक्तों को शिक्षा देने के लिए वे अनेक वेशभूषा और भिन्न भिन्न साज़ श्रृंगार करते हैं। सृष्टि के विस्तार के लिए उन्होंने पार्वती से शादी करने को अपनी सहमति भी दे दी । हर जन्म में पार्वती को शिव जी ने अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार किया। सच्चाई यही है कि यह दोनों ही सृष्टि के आदि पुरुष और प्रकृति है।

सती के योगाग्नि के बाद उन्होंने शिव को प्राप्त करने के लिए हिमालय राज के यहां जन्म लिया और किशोरावस्था में शिव जी को प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया। शिव प्रसन्न हुए । पार्वती की शादी शिव के साथ तय हो गई। बारात भी सज गई और बारात सभी देवताओं सहित मैना और हिमालय के द्वार पर पहुंच गए। शिव की आज्ञा से नारद जी ने बारात के आने की खबर पर्वतराज को दे दी । हिमालय समाचार सुनकर बहुत खुश हुए वे ब्राह्मणों और अन्य पर्वतों को लेकर शिव जी की अगवानी करने चले। अपने साथ बहुत सारी चीजें लेकर गए।

आज तो उनके घर सर्वव्यापी शिव पधारेंगे यह सोच-सोचकर हिमालय धन्य हो रहे थे। हिमालय शिव का दर्शन कर गदगद हो गए। महेश्वर के रूप में शिव की शोभा अद्भुत थी। उनके संपूर्ण शरीर से दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा था। उनके मुकुट नाना रत्नों से जड़ी थे, अंगों में रेशमी वस्त्र तथा आभूषण सुशोभित थे। सर्पों की माला उनकी कांति को दुगना कर रही थी। इस तरह हिमालय बारातियों की अगवानी करते हुए नगर की ओर बढ़ने लगे। महादेव जी अपने बारातियों के साथ हिमालय के साथ चलने लगे।

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पार्वती (Parvati) की मां मैना देवी के अंदर अहंकार था और शिव उनके अहंकार को तोड़ना चाहते थे। इसलिए शिव जी ने ब्रह्मा और विष्णु से कहा आप दोनों देवताओं सहित हिमालय के दूसरे द्वार पर पहुंचे मैं पीछे से आऊंगा। शिवजी की आज्ञा मानकर विष्णु जी हिमालय के अन्य द्वार पर पधारे। उनका रूप बहुत ही सुंदर था। उनके सौंदर्य के आगे करोड़ों कामदेव फीके पड़ रहे थे। विष्णु को देख कर मैना की आंखें फटी उन्हीं पर टिक गई। उन्होंने चहकते हुए नारद से पूछा, हे नारद क्या मेरी पार्वती के पति यही है? नारद जी ने कहा नहीं ,ये श्री हरी हैं। ये भगवान शिव के संपूर्ण कार्यों के अधिकारी प्रिय हैं । पार्वती के पति तो इनसे भी बढ़कर हैं ।ऐसी प्रकार मैना सभी देवताओं के बारे में नारद जी से पूछते जातीऔर नारद सभी सभी देवताओ को शिव का सेवक बताता ।

मैना मन ही मन पार्वती के भाग्य की सराहना करने लगी। उसी समय मैना के अहंकार को दूर करने के लिए शिव ने अद्भुत वेश बनाया। उनका अपना वेश जो था सो था ही उनके अनुचर भी वैसे ही बन के आए। कुछ के मुंह टेढ़े है तो कुछ लंगड़े कुछ काने तो कुछ का मुख ही नहीं कोई 100 मुख वाले तो किसी की नाक नहीं बड़ी विचित्र दृश्य था। उन सबों के बीच शिव वृषभ पर सवार थे। उनके स्वयं पांच मुख थे तीन नेत्र, मस्तक पर जटा,गले में सांपों की माला, दस हाथ, पिनाक और त्रिशूल हाथ में लिए बड़ा ही विचित्र वेश था शिव जी का। अपने दामाद का यह स्वरूप देखकर मैना के हाथ से परिछन वाली थाली छूट गई। भय से व्याकुल होकर वहा पृथ्वी पर गिर पड़ी। पार्वती के पास जाकर कहने लगी मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पडूंगी। समुद्र में कूद जाउंगी ,आग में लेकर तुम्हें जल जाऊंगी पर जीते जी इस पागल वर से तुम्हारी शादी नहीं करुँगी ।फिर पार्वती ने मन ही मन शिव से प्रार्थना की की आप मेरी मां को न डराएं। वे आपके इस स्वरुप को देखकर अत्यंत भयभीत हो गईं हैं ।कृपया आप अपना दिव्य रूप धारण कर लें ।शिव ने तुरंत अपना दिव्य रूप धारण किया । इस परमानन्द सुखदायक स्वरूप का दर्शन करके मैना फूले न समाई। अपने दामाद को निहारते हुए उनकी आरती उतारी और अपने भाग्य को सराहा ।

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