Pradosh Vrat Katha in Hindi – प्रदोष व्रत कथा

Pradosh Vrat Katha in Hindi – प्रदोष व्रत कथा

शिव जी के प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) का मनुष्य के जीवन को अत्यधिक प्रभावित करते हैं । सबसे पहले हम यह जानते हैं की इस व्रत को करने से क्या फायदा होता है और इसका क्या महत्त्व है ?

-इस व्रत को करने से हमारी सभी मनोकामना पूर्ण होती है ।
-हमारे सारे कष्ट दूर हो जाते हैं ।
-परदोष व्रत करने से पुत्र, धन, स्त्री ,पुत्र तथा सुख समृद्धि प्राप्त होता है ।

Pradosh Vrat Katha in Hindi

महत्त्वपूर्ण बात – प्रदोष व्रत का पूजा करते समय कभी बीच में नहीं उठना चाहिए, न कोई बात करना चाहिए ।
बीच में उठने से महादोष लगता है, कष्ट भुगतना पड़ता है। कहा जाता है की जब भक्त इस व्रत की पूजा करते हैं तो शिव- पार्वती तथा इनके चारो ओर सभी ऋषि मुनि तथा देवता गण इकट्ठे बैठते हैं और पूजा स्वीकार करते हैं ।

प्रदोष व्रत की कथा (Pradosh Vrat katha) – विदर्भ नामक देश में सत्यरथ नाम का एक राजा राज्य करता था । एक बार उसके राज्य पर शाल्व नामक राजा ने आक्रमण कर दिया । यद्यपि राजा बड़ा ही धार्मिक था लेकिन इस युद्ध में मारा गया । उसकी पत्नी उस समय गर्भवती थी । वह अपने को बचाने के लिए वहां से भाग कर जंगल की ओर चल दी । भूख प्यास से उसके प्राण व्याकुल हो रहे थे ।

वह एक तालाब के निकट पहुंची , उसी समय उसने एक पुत्र को जन्म दिया । रानी को जोर से प्यास लग रही थी। किसी तरह वह तालाब के निकट पहुँच कर पानी पीने लगी तभी एक मगर ने उसे निगल लिया। नवजात शिशु की रो- रोकर बुरा हाल हो गया। इस बालक को रोता देख शिव जी को बड़ी दया आ गई ।

उनकी कृपा से एक विधवा ब्राह्मणी अपने पांच साल के बेटे के साथ वहां पहुंची । बालक को देख उसे बड़ी दया आ गई मन में विचार करने लगी इस नवजात को यहां कौन छोड़ गया तथा इसका पालन कौन करेगा ?

उसी समय बूढ़े ब्राह्मण के भेष में शिव जी उसके पास आए और बोले, हे ब्राह्मणी इसका पालन तुम करो, अपना सारा संदेह त्याग दो और इसकी माँ बन कर इसका लालन -पालन करो । यह बच्चा अपने पूर्व जन्म में राजा का पुत्र था । वह त्रयोदशी व्रत करके शिव पूजन कर रहा था लेकिन किसी कारणवश उसने बिच में ही पूजा छोड़ कर दुसरे काम में लग गया । इस लिए उसे यह दोष लगा ।

अब तुम्हारे दो पुत्र हो गए । जब ये दोनों थोड़े बड़े हो जाएं तो इन दोनों को शिव पूजन करना सिखाना । इसके प्रभाव से इन्हें संसार का हर सुख प्राप्त होगा। शिव जी ने ब्राह्मणी को अपना स्वरूप का दर्शन दिया और अंतर्ध्यान हो गए ।

ये दोनों बच्चे बड़े होने लगे । दोनों ही शिव की आराधना करते थे। ये दोनों शाण्डिलप मुनि के शिष्य थे । उनके बताए मन्त्र से शिव की आराधना करते और प्रदोष व्रत भी करने लगे ।

एक दिन दोनों भाई नदी से स्नान करके वापस लौट रहे थे ,तब उन्हें धन से भरा एक मटका मिला । दोनों ने माँ को बताया । माँ ने कहा आपस में बाँट लो । छोटे वाले भाई ने यह कहकर इंकार कर दिया की यह मटका मुझे नहीं भैया को मिला है । इस पर मेरा नहीं उनका अधिकार है ।

कुछ दिनों के बाद में उसकी मुलाकात एक गंधर्व कन्या से हुई । उसके पिता ने अपने बेटी दामाद को पूरा राज -पाट सौंप दिया और खुद वन को चले गए ।

इस कथा का सारांश ये है की इस व्रत को नियम से करने पर हमारी सारी इच्छा पूर्ण होती है ।

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