Poem on River in Hindi – नदी पर कविता

Poem on River in Hindi

नदी पर कविता

मैं नदी हूँ, पर्वत से निकलती हूँ
मैदानों में बहती हूँ

ऊँचे नीचे राह पे चलके
मंजिल पे पहुँचती हूँ

देखो कभी मैं जल से लबालब होती थी
आज मैं कचरो से भरी पड़ी हूँ

मेरे वेग को देख लोग झूम उठते थे
आज उनके कृत से मायूस हो गयी हूँ

सिमट गयी हूँ किनारो पे
गुमसुम सी हो गयी हूँ

कब तक ढोऊं उनका बोझ
इस सोच में पड़ी हूँ

न पर्वत न पेड़ न बादल न जंगल
चारों तरफ कंक्रीटो का महल

मेरे सारे मित्र कम हो गए है
मैं अपनों के हाथों ही सूखी पड़ गयी हूँ

किनारो पे सिमटी इंतज़ार कर रही हूँ
अच्छे दिन आनेका बाट जो रहीं हूँ

वेग से बह सकूँ वसुंधरा पे कल कल करूँ
बाधक बने गति को जड़ से मिटा सकूँ !!!

 

नदी की चंचल धारा

नदी की चंचल धारा से इस जीवन को जुड़ जाने दो
इसकी निस्तब्धता को तोड़ो जलधार में इसे मिल जाने दो

कल- कल छल- छल बहती सरिता कुंठित मन गंठन खुलने दो
जीवंतता इसकी है पहचान उसे उच्छल तरंग बन जाने दो

अमृत कलश लेकर जब यह हिमशिखरों से नीचे आती है
वसुधा इसका कर्म क्षेत्र है इसको ना बाधित होने दो

नंदन -वन- कानन में बहती झर- झर झर- झर बहती जाती
ना रोको निर्मल चंचल जल को इसे मंजुल मुखरित होने दो

आकुल- व्याकुल हो जाती है कातर मन विह्वल ना होने दो
न छीनो इसकी मृदुता को इसे वारि विमल बन जाने दो

तूफानों से टकराने दो जौहर अपना दिखलाने दो
ना रोको बन चट्टान इसे युग- युग अविरल इसे बहने दो

चलता जीवन बहती नदिया वाहन को आगे बढ़ने दो
मंजिल पाना ही जीवन है इसे सागर में मिल जाने दो !!!

 

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