Poem on Environment in Hindi – पर्यावरण पर कविता

Poem on Environment in Hindi – पर्यावरण पर कविता

 

मानव का अटूट रिश्ता है पर्यावरण के साथ
यह जीवन बदलता है अपने बदलने के साथ
समय समय पर खौफ दिखाता , चोट भी करता है
पर मानव अपने कुकृतियों से बाज़ न आता है

पांच घटको के कथा यहाँ सुना रही हूँ
सब हाल बेहाल हुए है उनकी व्यथा सुना रही हूँ

धरती

कहने को माता हूँ सबकी
सबका भार उठाती हूँ
मेरे से ही जान जीवन है
अपना प्यार लुटाती हूँ

असहनीय बोझ बढ़ गया
काट गए पेड़ सारे
गंदगी का ढेर लग गया
नदियाँ सुख गए सारे

पर्वत

गर्व से शीश उठाकर जीने का सन्देश देता हूँ
डरो न आंधी पानी में , अडिग रहना सिखाता हूँ
स्वार्थ में अँधा हुआ मानव
क्यों इन बातों को माने
काट काट कर ढाह दिया मुझको
बना दिए ईमारत और कारखाने

पेड़

बिलख बिलख कर रो रहा है
दास्ताँ अपनी सुना रहा है
जमीं से हमें न उखाड़ो
जमी ही हमारा आसरा है

कुल्हाड़ी जब मुझपे चलाते हो
रक्त रंजीत हो जाता हूँ
सारे दर्द सेह कर भी
तुम्हे सब कुछ दे जाता हूँ

नदी

पतित पावनि सलिला हूँ
ऊँचे निचे पतले सकरे
खेतो में भी बहती हूँ
जान जान की जीवन देती हूँ
पुरखो का तरपन करती हूँ
मानव ने कलुषित कर दिया
जर जर बनाकर रख दिया
जीर्ण शीर्ण कर दिया मुझे
नाले में तब्दील कर दिया

वायु

अलमस्त गगन की रानी हूँ
इठलाती हूँ बल खाती हूँ
बाग़ बगीचे बन उपवन में
हस्ती खिल खिलाती हूँ

हसीं मुझसे रूठ गयी
गम गिन होकर ठहर गयी
जो खुशबू मेरे तन मन में थी
वह दूषित होकर रह गयी

पग पग पर खतरा भारी है
न दो आमंत्रण विपदाओ को
सावधान हो जाओ मानव
प्रकर्ति के समझो इशारो को

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