Parshuram Story in Hindi – श्री राम ने परशुराम का अहंकार कैसे तोड़ा

Parshuram Story in Hindi – श्री राम ने वैष्णव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर परशुराम का अहंकार कैसे तोड़ा

यह बड़ी रोचक कथा है । यह घटना उस समय की है जब राजा दशरथ अपने चारों पुत्रों का विवाह करके अपने पुरे दलबल के साथ अयोध्या लौट रहे थे । तभी अग्नि के समान भयानक प्रतीत होने वाले परशुराम (Parshuram Story) पर नजर पड़ी। वसिष्ठ आदि ब्रह्मऋषि आपस में कहने लगे की अचानक ये यहां क्यों आ गए ? अर्जुन के द्वारा इनके पिता के मारे जाने के कारण इन्होंने कई बार क्षत्रिय वंश का इस पृथ्वी से नाश करके अपना बदला ले लिया है । फिर अभी क्या बात हो गई जो इनका यहां अचानक पदार्पण हुआ । निकट आने पर सभी ने उनका अर्ध्य दिया और मधुर स्वागत किया ।

ऋषियों का स्वागत स्वीकार कर परशुराम श्री राम (Shri Ram) से बोले – तुम्हारा पराक्रम तो अद्भुत है। तुमने शिव धनुष को तोड़कर अपने पराक्रम का अद्भुत परिचय दिया है । बहुत अच्छी बात है । उसके टूटने की बात सुनकर मैं एक दूसरा श्रेष्ठ धनुष लेकर आया हूँ । यह परशुराम का भयंकर और विशाल धनुष है । अगर हिम्मत है तो इसपर प्रत्यंचा चढ़ाओ और अपना बल दिखाओ ।

परशुराम के ऐसे वचन सुनकर राजा दशरथ दुखी हो गए । उन्होंने विनम्रता पूर्वक कहा ये छोटे बालक हैं इन्हें क्षमा करें । आपके जैसा महान ज्ञानी और दानी पुरुष इस पुरे पृथ्वी पर नहीं है । आप हीं हैं जिन्होंने पूरी पृथ्वी कश्यप जी को दान में दे दिया । पर परशुराम ने राजा दशरथ के कहे इन वचनों की अवहेलना कर, श्री राम से बोले ये दो धनुष सबसे श्रेष्ठ थे । इन्हें विश्कर्मा ने अपने हाथों से बनाया था ।

इनमे से एक धनुष देवताओं ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध करने के लिए भगवान शंकर को दे दिया था । राजा जनक के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने वरदान स्वरूप उन्हें दे दिया था | जिसको तुमने तोड़ा । दूसरा जो मेरे हाथ में है इसे देवताओं ने विष्णु को दिया था । शत्रुनगरी पर विजय पानेवाला यही यह वैष्णव धनुष है ।

अब तुम अपने क्षत्रिय धर्म को सामने रखकर वैष्णव धनुष पर ऐसा वाण चढ़ाओ जो शत्रुनगरी पर विजय पाने में समर्थ हो । सच्चाई यह थी की परशुराम क्षत्रिय लोगों से वैर भाव रखते थे । श्री राम भी क्षत्रिय कुल के थे और वीर भी थे । इसलिए परशुराम में उनके प्रति ईर्षा की भावना आ गई थी ।

श्री राम ने बड़ी विनम्रता से उनकी बातों को काटते हुए कहा – हे ब्राह्मण ! आपने अपने पिता के वध का बदला क्षत्रिओं से ले लिया । यह आपके वीर पुरुष होने का सुचक है । हाँ , मैं क्षत्रिय धर्म से युक्त हूँ । आप मुझे पराक्रमहीन न समझें । राम ने इतना कहकर कुपित परशुराम के हाथ से धनुष और वाण ले लिया । साथ ही उनकी वैष्णवी शक्ति भी वापस ले लिया ।

धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर श्री राम ने परशुराम से कहा आप ब्राह्मण होने के नाते मेरे पूज्य हैं । आपका विश्वामित्र जी के साथ भी अपनत्व का संबंध है इसलिए इस प्राण संहारक बाण को आपके शरीर पर नहीं छोड़ सकता । मैं समझता हूँ की आप में शीघ्रता पूर्वक कहीं भी आने -जाने की शक्ति है , उसे नष्ट कर दिया जाए, या फिर आपने जो अपने तपोबल से अनुपम पुण्य लोकों को प्राप्त किया है उन्हीं को नष्ट कर दिया जाए । यह वैष्णव वाण पर जब एक बार प्रत्यंचा चढ़ गया तो निष्फल नहीं हो सकता ।

श्री राम के इस अद्भुत धनुषधारी रूप को देखने के लिए समस्त देवता और ऋषि वहां पर आ गए । सभी लोग यह दृश्य देख जड़वत हो गए। परशुराम के शरीर से वैष्णवी तेज निकल जाने के कारण वे वीरहीन हो गए ।

परशुराम अब समझ गए की श्री राम कौन हैं ? उन्होंने उनसे कहा हे राघव ! आप मेरी गमन शक्ति को नष्ट न करें। आप मेरे पुण्य द्वारा प्राप्त अनुपम लोकों को नष्ट कर दें ।

हे प्रभु ! आप शत्रुओं के संताप देने वाले वीर महापुरुष दूसरा और कोई नहीं विष्णु देव हैं । युद्ध में आपसे कोइ सामना नहीं कर सकता । आप स्वंयम त्रिलोकीनाथ हरि हैं । आपसे पराजित हो कर मैं लज्जा का नहीं, बल्कि सैभाग्य का अनुभव कर रहा हूँ ।

इस प्रकार श्री राम ने परशुराम के अहंकार को पल भर में चकनाचूर कर दिया ।

तो दोस्तों, आप इस कथा से समझ गए होगें कि अहंकार मनुष्य को पर्वत से राई बना सकता है । हमारे सारे कर्मों को मिट्टी में मिला सकता है । अहंकार हमारी उन्नति का सबसे बड़ा दुश्मन है और विनम्रता हमारा मित्र ।

पढ़ने के लिए आपको बहुत -बहुत धन्यवाद !!!

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