Navagraha Mantra – नवग्रह क्या हैं? ये ग्रह मनुष्य के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं ?

नवग्रह क्या हैं (Navagraha)? ये ग्रह मनुष्य के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं ?

Navagraha Mantra

ब्राहमंड  में अनेक ग्रह और नक्षत्र हैं जो भिन्न -भिन्न समय में अलग  अलग तरीके से मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं । मुख्य रूप से ग्रह नौ होते हैं । इनकी योग्यता के अनुसार ब्रह्मा जी ने इनको कार्य भार सौंपा है। नवग्रह (Navagraha) की पूजा तथा इसका जाप करने से मनुष्ट के जीवन में उन्नति सुख शांति तथा अनेक परेशानियों का निवारण होता है। नवग्रह (Navagraha) में सबसे पहला स्थान सूर्य ग्रह का होता है ।

1 – सूर्य ग्रह
2 – चंद्र ग्रह
3 – मंगल ग्रह
4 – बुध ग्रह
5 – वृहस्पति ग्रह
6 – शुक्र ग्रह
7 – शनि ग्रह
8 – राहु ग्रह

9 – केतु ग्रह

सूर्य ग्रह

सूर्य की उत्पत्ति सृष्टि के आरंभ में हुई है ।  भगवान सूर्य का रंग लाल होता है। इनके हाथ में लाल रंग का कमल होता है। कमल के आसान पर शोभायमान होते हैं।सोने का मुकुट और गले में रत्नों की माला  होती  है। कानों में दमकता कुण्डल और कवच होता है । इनके वाहन सात घोड़ों वाला रथ है ।रथ में केवल एक चक्र  होता है जो वर्ष कहलाता है। इस रथ में 12 अरे हैं जो महीनों को दर्शाते हैं । 6 नेमियां 6 ऋतुओं को दर्शाती हैं- सरदी, गरमी, बरसात, शिशिर, हेमंत, पतझड़ ।  मार्कण्डये पुराण के अनुसार सूर्य देव ब्रह्म स्वरुप हैं । एक बार दैत्य दानवों ने मिलकर युद्ध किया और देवताओं के सारे अधिकार छीन लिए।  तब देव माता अदिति ने सूर्य देव की उपासना की थी, वे प्रसन्न हुए और उनके पुत्र रूप में अवतार ले कर राक्षसों को हराया और सनातन  वेद मार्ग की स्थापना की । इसलिए इन्हें आदित्य भी कहा गया है । भगवान सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं । इनकी दशा 6 वर्ष की होती है। सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन अर्घ देना तथा मोती धारण करना चाहिए ।

सूर्य की शान्ति के लिए दो मन्त्र हैं –

1 – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
2 – ऊँ घृणि सूर्याय नम:इनम से कोई एक मन्त्र का निश्चित संख्या में नित्य जाप करना चाहिए । जप की कुल संख्या 7,000 है ।

चंद्र ग्रह

श्री भागवत के अनुसार चन्द्रमा अनुसूया और अत्रि मुनि के पुत्र हैं। इनका रंग गौर है। इनका रथ घोड़ा वस्त्र सभी गौर हैं। इनके सर पर सुन्दर मुकुट, गले में मोतियों की माला है । इनके एक हाथ में गदा और दूसरे हाथ में वर मुद्रा है। चन्द्रमा सोलह कलाओं से युक्त हैं | भगवान श्री कृष्ण इन्हीं के वंश में अवतार लिए थे इसलिए श्री कृष्ण भी सोलह कलाओं से युक्त हैं । इनका विवाह प्रजापति दक्ष के 27 कन्याओं-अश्वनी, भरनी, कृत्तिका रोहणी इत्यादि के साथ हुआ है। ये कन्याएं 27 नक्षत्रों के रूप में जानी जाती हैं । ब्रह्मदेव ने चंद्र की योग्यता के अनुसार इन्हें बीज औषधि जल तथा ब्राह्मणों का राजा बना दिया। पूर्णिमा को चंद्रोदय के समय ताँबे के वर्तन में मधु से बना पकवान या खीर अर्पित करने से ये प्रसन्न होते हैं । इनके प्रसन्न होने से आदित्य वायु विश्वदेव मरुदण्ड तृप्त होतें है । चंद्र देव के अप्रसन्न होने से मानसिक चंचलता , निर्णय लेने में परेशानी , स्वास आदि की तकलीफ होती  है । इनकी महादशा दस वर्ष की होती है । ये कर्क राशि के स्वामी हैं ।

इनका मंत्र हैं

1 – ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः
2 – ऊँ सों सोमाय नमः

इनमें से किसी एक मंत्र का नित्य और निश्चित संख्या में जाप करना चाहिए । ये जाप शाम को करना चाहिए । जप की कुल संख्या 11,000 है ।

मंगल गृह

हमारे पुराणों में मंगल गृह के पूजा की महिमा बताई गयी है।  यह गृह प्रसन्न होकर मनुस्य की हर इच्छा पूर्ण करते है ।
मंगल व्रत में ताम्र पत्र पर भौम मंत्र लिखकर मंगल की प्रतिमा स्थापित करके पूजा करने से तथा मंगल का पाठ करने से ऋण से मुक्ति मिलती है । इसकी शांति के लिए प्रवाल रतन धारण लरना चाहिए और हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए । इस गृह के महादशा सात वर्षो तक रहती है ।  मेष तथा वृश्चिक राशि का स्वामी है । मंगल गृह की उत्पत्ति भगवान् विष्णु सुर पृथ्वी से हुई है। इन के शरीर में लाल रोयें होती है और इन चार भुजाये होते है । इनकी हाथ में क्रम से अभय मुद्रा म त्रिशूल, गदा और वर मुद्रा है। यह लाल वस्त्र, लाल माला और सर मुकुट पहनते है। इनकी सवारी भेड़ है ।

इनका मंत्र हैं

1 – ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
2 – ॐ अं अंगारकाय नम:

इन में से किसी एक मंत्र का जाप प्रातः नित्य और निश्चित संख्या में करना चाहिए। इस जाप के कुल संख्या 10,000 हैं ।

बुध गृह

बुध अपनी चरों भुजाओ में क्रम से तलवार ढाल गदा और वर मुद्रा धारण करते है ।
बुध पीले रंग की माला पहनते है, इनका वस्त्र भी पीला होता है, इनका वहां सिंह है। अथर्व वेद के अनुसार इनकी माता का तारा और पिता का नाम चंद्र देव है । इनकी बुद्धि प्रखर होने का कारन ब्रह्मा जी ने इनका नाम बुद्ध रखा। ये सभी शास्त्रों में पारंगत थे ।
इनकी योग्यता देखकर ब्रह्मा जी ने इन्हे   भूतल का स्वामी तथा गृह बना दिया।
इनकी योग्यता से प्रभाभित होकर महाराज मनु ने अपनी पुत्री इला का विवाह इनके साथ कर दिया । बुद्ध ब्रह प्रायः सभी का मंगल करते है लेकिन सूर्य की गति का उल्लंघन करने से आंधी , पानी और सूखे का भय उत्पन्न  होता है ।
बुद्ध मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है , इनकी महादशा सात वर्षो की होती है ।

बुद्ध गृह की शान्ति की लिए पन्ना धारण करना चाहिए ।

इनका मंत्र हैं

1 – ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
2 – ऊँ बुं बुधाय नम:

इन में से किसी एक मंत्र का जाप प्रातः नित्य और निश्चित संख्या में करना चाहिए । इस जाप के कुल संख्या 9,000 हैं ।

बृहस्पति गृह

वृहस्पति गृह का रंग पीला होता है, सर पे मुकुट , पीला वस्त्र और सुन्दर माला पहनते है। ये कमल के आसन पर विराजमान होते है ।

वृहस्पति देव अंगी राज के पुत्र और देवताओ के गुरु है ।  इन्होने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी जिससे शंकर जी प्रसन्न होकर उन्हें गुरु पद से सम्मानित होने का वर दिया । ऋग्वेद के अनुसार यह गृह बहुत ही सुन्दर सुर सौम्य है । ये अपने भक्तो पर प्रसन्न होकर उन्हे बुद्धिमान , समृद्धिमान बनाते है  और संमार्ग पर चलाते है । इनका वाहन रथ है जो सोने का होता है और पीले रंग के आठ घोड़े होते है । वृहस्पति धनु और मीन राशि के स्वामी है । इनकी महादशा 16 वर्षो की होती है। इनको प्रसन्न करने के लिए गुरुवार का व्रत करना चाहिए और पुखराज धारण करना चाहिए।

इनका मंत्र हैं

1 – ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरूवे नमः
2 – ॐ बृं बृहस्पतये नम:

इन में से किसी एक मंत्र का जाप संध्या काल में और निश्चित संख्या में करना चाहिए । इस जाप के कुल संख्या 19,000 हैं ।

शुक्र गृह

शुक्र गृह दैत्यों के गुरु है , इनका वर्ण श्वेत है। सर पे मुकुट और गले में सफ़ेद मोतियों की माला पहनते है और सफ़ेद कमल के आसन पर विराजमान है।   इन्होने शिव की कठोर तपस्या करके मृतुन्जय विद्या की प्राप्ति की थी। इस मंत्र के बल पर दानवो को जीवित कर देतें थे। मतस्य पुराण के अनुसार असुरों के कल्याण के लिए जितना अधिक इन्होने कठिन व्रत किया उतना किसी ने  भी नहीं किया । शिव ने इनको वरदान दिया थी की तुम देवताओ को युद्ध में हरा दोगे और तुम्हे कोई नहीं मार सकेगा । उनकी योग्यता देखकर ही धन के अध्यक्ष बना दिया । इन्होने अपनी सारी संपत्ति असुरों के देकर स्वयं के लिए तपस्वी जीवन चुना । ब्रह्मा जी ने मनुस्य का कष्ट दूर करने का भार इन्हे सौपा । मतस्य पुराण के अनुसार इनका वाहन रथ है और इसमें अग्नि के सामान आठ घोड़े होते है । शुक्र वृष और तुला राशि के स्वामी है। इनकी महादशा 20 वर्ष की होती है । इस गृह की शांति के किये हीरा पहनना चाहिए ।

इनका मंत्र हैं

1 – ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः
2 – ऊँ शुं शुक्राय नम:

इन में से किसी एक मंत्र का जाप सूर्य उदय के समय और निश्चित संख्या में करना चाहिए । इस जाप के कुल संख्या 16,000 हैं ।

शनि गृह

शनि गृह का शरीर इंद्रनीलमणि की तरह होता है । इनके सर पर मुकुट और गले में माला और नील रंग का वस्त्र पहनते है|  इनका वाहन गिद्ध है और रथ इनका लोहे का बना होता है । शनि देव सूर्य और छाया के पुत्र है । इनकी पत्नी के शाप के कारन इनकी आँखें हमेशा झुकी होती है। ये शिव के परम भक्त है और इनकी सेवा में हमेशा लीन रहते है । एक कथा अनुसार इनकी पत्नी संतान की इच्छा से इनके पास आयी लेकिन इन्होने शिव  के ध्यान में लीन होने का कारन उनकी और नहीं देखा, इनकी पत्नी अपनी उपेक्षा किये जाने पर क्रोधित हो गयी और शाप दिया की आज से तुम जिसे भी आँख उठा कर देखोगे उसका नाश हो जायेगा तब से वो अपनी दृष्टि नीचे ही रखते है ।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि गृह यदि रोहिणी सकत भेदन करे दे तो पृथ्वी पर अकाल पड़ जाता हैं, यह स्थिती एक बार राजा जनक के राज्य में आयी थी । ये मकर और कुम्भ राशि का स्वामी है और इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है ।
इनकी शान्ति के लिए मृत्युंजय जाप करना चाहिए एयर नीलम धारण करना चहिये ।

इनका मंत्र हैं

1  – ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
2 – ऊँ शं शनैश्चराय नम:

इन में से किसी एक मंत्र का जाप संध्या काल में और निश्चित संख्या में करना चाहिए । इस जाप के कुल संख्या 23,000 हैं ।

राहु गृह

राहु की माँ का नाम सिहिंका है , इनका मुख भयंकर है और सर पर मुकुट और गले पर माला ।
यह सिंह के आसन पर विराजमान होते है । समुद्र मंथन के बाद जब विष्णु मोहिनी का रूप धारण करके देवताओ को अमृत पीला रहे थे तो राहु भी देवता का वेश बनाकर उनकी पंक्ति में बैठ कर  अमृत पान करने लगा। उसी समय सूर्य और चन्द्रमा ने बताया की राहु राक्षस है और विष्णु ने तुरंत राहु का सर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन अमृत का कुछ अंश उसके शरीर में रह जाने के कारन वह अमर हो गया इसीलिए ब्रह्मा को इसे ग्रह बनाना पड़ा।  ग्रह होने के कारन राहु सूर्य और चन्द्रमा को शत्रु भाव से देखता है इसलिए सूर्य और चंद्र ग्रहण भी लगता है ।
इनका रथ अंधकारमय होता है , इसे काले रंग के आठ घोड़े खीचतें हैं। इसकी महादशा 18 वर्ष की होती है ।
यह गृह प्रायः दुखदायक होता है । जिसकी कुंडली में राहु की स्थिति अच्छी नहीं होती उसको धड़ के ऊपर की बीमारी होती है , इसकी शांति के लिए मृत्युंजय जाप और फिररोज़ा पत्थर पहनना चाहिए ।
इनका मंत्र हैं
1 – ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
2 – ऊँ रां राहवे नम:

इन में से किसी एक मंत्र का जाप रात्रि  काल में और निश्चित संख्या में करना चाहिए । इस जाप के कुल संख्या 18,000 हैं ।

केतु गृह

केतु गृह राहु का ही आधा भाग है, इसका धड़ ही केतु के नाम से जाना जाता है । यह कला वस्त्र धारण करता है ,इसका वाहन गिद्ध है । मतस्य पुराण के अनुसार केतु बहुत है लेकिन धूम केतु ही मुख्य है। यह छाया गृह ही कहलाता है ।

यह सम्पूर्ण जगत को प्रभाभित करता है । ज्योतिष के अनुसार राहु के अपेक्षा केतु सौम्य होता है और हितकारी भी होता है । कहते है किसी विशेष समय व्यक्ति को बहुत ऊंचे पड़ पर पहुंचा देता है । केतु की महादशा सात वर्ष की होती है । इसकी शान्ति के लिए लहसुनिया  पत्थर पहनना चाइये और मृत्युंजय मन्त्र का जाप करना चाहिए ।

इनका मंत्र हैं

1 – ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
2 – ॐ कें केतवे नमः
इन में से किसी एक मंत्र का जाप रात्रि  काल में और निश्चित संख्या में करना चाहिए । इस जाप के कुल संख्या 17,000 हैं ।
इसकी पूर्णाहुति में कुश के आसन पर बैठकर हवन करना चाहिए ।

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