Navadurga Names in Hindi – नव दुर्गा के नाम और उनकी कथाएं

जिनका प्रकाश सम्पूर्ण जगत में लाखों सूर्य के समान चमक रहा हो, जिन्होंने ब्रह्माण्ड की रचना अपनी एक मधुर मुस्कान से की हो, जो सम्पूर्ण जगत की आदि शक्ति हैं, उनका वर्णन करना किसी मानव के लिए ठीक वैसा ही है जैसे सूरज को दीप दिखाना। माँ भगवती ने अपने भक्तों के लिए समय समय पर अनेक रूप धारण करके उनका कल्याण किया।

आदि शक्ति के अनंत रूप हैं और उनके अनगिनत नाम, लेकिन मुख्य रूप से इनके नौ रूपों (Navadurga) को भक्त वृन्द खूब स्मरण रखते हैं।

नवदुर्गा – Navadurga Names

Navadurga Names in Hindi
1 – शैलपुत्री  (Shailputri)

माँ जगदम्बा का पहला रूप शैलपुत्री है। इनका जन्म मैना और हिमालय के घर में हुआ था। इसलिए इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। इनका सौम्य रूप देखते ही भक्तों के सारे दुःख मिट जाते हैं। सिर पर मुकुट, गले में हार, हाथ में त्रिशूल और कमल के फूल शोभायमान होता है । इनकी सवारी वृषभ है। भगवती शैलपुत्री नव दुर्गाों (Navadurga) में पहली दुर्गा हैं जिनकी अनुपम छटा से सारा संसार जगमगा रहा है।

अपने पूर्व जन्म में माँ दुर्गा (Ma Durga) प्रजापति दक्ष और वीरणी के घर जन्म ली थी। सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी ने इनकी अथक साधना करके इन्हे प्रसन्न किया था । इनसे विनती की थी कि आप देख के घर जन्म लेकर शिव से विवाह करें और सृष्टि के विस्तार में मेरी सहायता करें। माँ जगदम्बे ने उनकी बात स्वीकार कर दक्ष के घर जन्म ली और बड़े होने पर शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या किया। तब उनका विवाह शिव से संपन्न हुआ।

एक बार दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया। सभी देवताओं को यज्ञ भाग लेने के लिए आदर के साथ आमंत्रित किया, लेकिन अपने जमाता शिव को जान बूझ कर नहीं बुलाया। सती को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता के घर यज्ञ हो रहा है तो वह अपने पिता के यहाँ जाने के लिए आतुर हो उठी। सती अपने शिवे के पास गयी और उनसे जाने की इच्छा व्यक्त की। शिव जी ने कुछ चिंतन करके बोला- हे सती आपका वहाँ अभी जाना उचित नहीं है, वे मुझसे इस वक़्त रुष्ट हैं, इसलिए उन्होंने हमें निमंत्रण नहीं दिया है, पर सती शिव की बात मानने को तैयार नहीं हुईं।

सती ने कहा-अगर आपको नहीं जाना है तो ना सही, मैं अकेले ही चली जाउंगी। सती के हठ के कारण, शिव ने हामी भर दी। सती जब वहां पहुंची, तो देखा घर का कोई भी सदस्य सिर्फ उनकी माँ के अलावा उन्हें देखकर प्रसन्न नहीं हुआ। माँ ने उनको गले लगाया, बाकि सबका व्यवहार बहुत ही रुखा था। जो देवता आये हुए थे वे शिव निंदा से परे नहीं थे। दक्ष ने तो शिव के लिए कई अपमानजनक शब्द कहे थे। सिर्फ ऋषि दधीचि ने ही दक्ष का विरोध किया और कहा शिव की निंदा करना आपके लिए हितकर नहीं।

सती का ह्रदय अपने पति की निंदा सुनकर व्याकुल हो उठा। उन्हें बार बार ये लग रहा था, की शिव की बात ना मान कर , उन्होंने गलत किया है। सती अपने शिव का अपमान सह न सकी और अपने शरीर को योग अग्नि के द्वारा भस्म कर दिया। इस असहनीय घटना से शिव जी तिलमिला उठे और देख के दक्ष के यज्ञ को विध्वंश कर दिया ।

अगले जन्म में शैलपुत्री पर्वत राज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस जनम में भी उन्होंने शिव को ही अपना पति रूप में वरन किया और उनकी अर्धांग्नी बनी। शैलपुत्री के रूप में माता की शक्तियां अनंत है । इस प्रथम दिन में योगी अपना मन मूलाधार चक्र में स्तिथ करते है , यहीं से योगी की योग साधना का शुरुआत होता है ।

2 ब्रह्मचारिणी (Brhamcharini)

नौ शक्तियों (Navadurga) में से माँ दुर्गा (Ma Durga) का ब्रह्मचारिणी रूप दूसरा है। यहाँ पर समझने वाली बात ये है की इन्हे ब्रह्मचारिणी क्यों कहते है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली अर्थात ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तपस्या करने वाली देवी । माता ने अपने भक्तों को सुख प्रदान करने के लिए, शिव को हर जनम में प्राप्त करने किए लिए अत्यंत घोर तपस्या की इस लिए इनका नाम ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ । इनका स्वरुप अत्यंत भव्य और ज्योतिर्मय है ।

ऐसा अद्भुत और दुष्कर तप इस पृथ्वी पर किसी ने न किया था और न कोई कर पायेगा, यह ब्रह्मा वाक्य है । एक हज़ार वर्षो टक फल मूल खा कर वन में बिताया । सौ वर्षो तक साक खाया, कुछ दिन कठिन उपवास करके आकाश के नीचे वर्षा, सर्दी और धुप के कठिन ताप सही , इसके बाद तीन हज़ार वर्षो तक केवल बेल पत्ते खाकर शिव का ध्यान किया और फिर निराहार और निराजल रह कर कई वर्षो तक तपस्या किया । पत्तो को भी खाना छोड़ देने के कारन इनका नाम अपर्णा (Aparna) पड़ा ।

इतने लम्बे समय तक कठिन तपस्या से देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया था । ब्रह्मा ने आकाशवाणी के द्वारा कहा की हे देवी आप की इस अलौकिक तपस्या के सराहना चारों दिशाओ में हो रही है , आपकी मनोकामना अवस्य पूर्ण होगी। जब इनकी माँ ने जब इनकी कठिन तपस्या के बारें में जाना तब वो व्याकुल हो उठी और उन्हें तप से विरक्त करने के लिए उमा उमा कहकर आवाज़ देने लगी तब से उनका नाम उमा भी पड़ गया ।
इनकी पूजा करने से मनुस्य में तप, त्याग वैराग्य और संयम की वृद्धि होती है । संघर्ष में भी उनका मन संयम में रहता है और हर जगह विजय की प्राप्ति होती है , इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्तिथ होता है और माँ की भक्ति और कृपा बनी रहती है ।

3 चन्द्रघंटा (Chandraghanta)

माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। इस रूप में माँ की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत दिखाई देता है । माँ का यह स्वरुप परम शांतिदायक और शुभ है । ललाट में घंटे के आकर का अर्धचंद्र है इसे से चंद्रघंटा देवी कहते है । इनका रंग सोने के तरह चमकता है और इनके आवाज़ में घंटे के तरह भयानक रोष भरा आवाज़ सुनकर दैत्य भयभीत रहते है । तीसरे दिन की पूजा का विशेष महत्तव हैं । भक्त को माता की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होता है और अनेक सुगंधो का अनुभव होता है और दिव्य आवाज़ भी सुनाई पड़ता है । इस समय साधक को बहुत संयम और सावधानी की जरुरत पड़ती है

चंद्रघंटा की आराधना सतत फलदायिनी है। अपने भक्तो को जीवन के हर क्षेत्र में विजयी बनती है और उन्हें निर्भयता के साथ साथ विनम्रता और सौम्यता भी प्रदान करती है । जो व्यक्ति इनकी सच्चे दिल से पूजा करते है उनके मुख नेत्र और काया में विशेष कांति आ जाती है । दिव्या स्वर और अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता हैं । ऐसे व्यक्ति जहाँ भी जातें है उन्हें देख कर लोगो को सुख शान्ति का अनुभव होता है , साधक की शरीर से अलौकिक प्रकाश निकलता है लेकिन अद्रश्य होता है। इस बात का अनुभव केवल साधक और उनके संपर्क में आने वाले लोग ही अच्छी तरह से करते है। इस समय साधक का मन मणिपुर चक्र में होता है । साधक को इस समय अपने तन और मन दोनों को शुद्ध रखना चाहिए और माता की शरण में दिन रात समर्पित कर देंना चाहिए । मानव को अपने मन वचन एवं कर्म को शुद्ध और पवित्र रख कर माँ की शरण में जानें से वह परम पद का अधिकारी हो जाता है ।

4 कूष्माण्डा (kushmaanda)

माँ दुर्गा के चौथे स्वरुप को कूष्माण्डा कहते है । इन्होने अपने मंद मंद हंसी से ब्रह्माण्ड उत्पन्न किया इसलिए इनको कूष्माण्डा देवी के नाम से पुकारते है। जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था और चारों और तम का ही चादर पसरा हुआ था तब देवी ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया इसलिए इन्हे आदिशक्ति के रूप में जाना जाता है ।

सूर्य लोक में निवास करने की क्षमता केवल इनमें ही है । इनके शरीर के आभा सूर्य के समान है इसलिए इनको कहा गया है “तेरा महान तेज है छाया हुआ सभी स्थान सृष्टि के वस्तु वस्तु में तुम हो रही विद्यमान” । ब्रह्माण्ड के जड़ चेतन जिव जंतु सभी में इनकी तेज की ही छाया है ।

कूष्माण्डा देवी का वाहन सिंह है । बलि के रूप में कूष्माण्डा (कुम्हड़ा/ कद्दू ) की बलि इन्हे सर्व प्रिय है।

नवरात्री पूजा में कूष्माण्डा माता की पूजा चौथे दिन की जाती है। साधक का मन इस दिन अनाहत चक्र में स्तिथ होता है । साधक को इस दिन मन , शरीर और चित को पवित्र और दृढ़ करके माँ की पूजा अर्चना में लगा देना चाहिए । इस दिन की पूजा से रोग मुक्ति भक्ति , यश और बल की प्राप्ति होती है । माना जाता है की अपने भक्त के अलप निश्चल भक्ति से ही माँ प्रसन्न हो जाती है और उसे मन चाहा वरदान देती है । माँ की पूजा वेदो में लिखित विधि के अनुसार ही उचित है । यह दुख से भरा हुआ संसार माँ अपने भक्त के लिए अत्यंत सुखद बना देती है ।

5  स्कन्द माता (Skand mata)

माँ के पांचवे स्वरुप की पूजा स्कन्द माता के रूप में होता है। स्कन्द अर्थात कुमार कार्तिकेय जो माँ दुर्गा के पुत्र है । भगवन स्कन्द की माता होने के कारन माँ के इस रूप को स्कन्द माता के रूप में जाना जाता है। स्कन्द को देवासुर संग्राम में देवताओ का सेनापति बनाया था । कार्तिकेय को पुराण में शक्तिधर कहकर भी सम्बोधित करते है । इनका वाहन मयूर है इसलिए इन्हे मयूर वाहक के रूप में भी जाना जाता है ।

इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में स्तिथ होता है। उसका मन समस्त लौकिक माया बंधन से मुक्त होकर माँ के चरणों में पूर्णतया समर्पित हो जाता है । इस समय साधक को बड़ी सावधानी से उपासना और ध्यान करना चाहिए . मन पर पूर्ण नियंत्रण होना अति आवश्यक है ।

माँ स्कन्द की उपासना से इस मृत्यु लोक में भी भक्त को सुख शान्ति मिलती है और मोक्ष के द्धार खुल जातें है ।
सबसे अच्छी बात ये होती है की माँ की पूजा के साथ साथ कार्तिकेय की पूजा अपने आप हो जाती है । इन का भक्त अलौकिक तेज और कांति से भर जाता है । इस दिन की पूजा में मन को एकाग्र करना आराम आवश्यक है। इस भवसागर से पार करने का सबसे सुलभ और उत्तम मार्ग यही है।

6 कात्यायनी  (Kaatyayani) 

माँ दुर्गा का छठा रूप कात्यायनी के रूप में पूजा जाता हैं । माँ का यह स्वरुप अमोघ फल दायनी है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्तिथ होता है । योग साधना में इस चक्र का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान हैं। इस चक्र में स्तिथ साधक माँ कात्यायनी को अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है। सहज और सरल भाव से जो साधक इनकी उपासना करते है माँ का दर्शन अवश्य सम्भावी प्राप्त होता है ।

माँ के इस स्वरुप का नाम कात्यायनी पड़ने के पीछे कुछ कथाएं है। कात्यान नाम के एक महान ऋषि थे जिन्होंने माँ की अकूत साधना की थी और माँ ने प्रसन्न होकर इनके यहाँ पुत्री के रूप में जन्म लेकर इनकी इच्छा पूरी की ।

 दूसरी कथा ये है की जब दानव महिषासुर का पृथ्वी पर अत्यचार बढ़ गया था तो उस दुख से निजात पाने के लिए ब्रह्मा विष्णु महेश तीनो ने अपना अपना तेज का अंश देकर एक देवी को उत्पन्न किया और इनकी सर्व प्रथम पूजा महर्षि कात्यान ने ही किया इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा ।
कृष्ण को  पति रूप में गोपियों ने यमुना तट पर इन्ही देवी की पूजा की थी, आज भी जब किसी लड़की की शादी में कोई बाधा आता है तो कात्यायनी देवी का जाप सुझाब देतें है। ये व्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी है ।

इनका सौंदर्य सोने की तरह चमकता है।  इनका वाहन सिंह है । इनकी उपासना से भक्त को अर्थ धन काम मोक्ष सभी चीज़ों की प्राप्ति होती है । यहाँ तक की जन्म जन्मांतर के पाप धूल जातें है , साधक को परम गति मिलती है ।

7 कालरात्रि  (kaalratri)

नवरात्र के पूजा में माँ का ये सातवां रूप है ।  इनका शरीर का रंग काजल की तरह कला होता है । इनके गले में बिजली की तरह चमकने वाला हार है । इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल होते है । इनके शरीर तथा आँखों से विद्युत की तरह चमकने वाली किरणे निकलती है। इनके सांस से अग्नि निकलती है , इनके रूप देखने में जितना विकराल होता हैं ये अपने भक्तों का उतना ही शुभ फल देती है ।
इनका दूसरा नाम शुभंकरी भी है अतः भक्तों को इनसे भय खाने की जरुरत नहीं है ।
इन्होने चण्ड मुंड का विनाश किया और रक्त बीज का वध करके काल रात्रि देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुई । रक्त बीज का वध करते समय रक्त के कण को पृथ्वी पर गिरने के पहले ही पी जाती थी ।  इस तरह उसका वध करके सम्पूर्ण सृष्टि को शान्ति प्रदान किया ।

माँ कालरात्रि के स्मरण मात्र से दैत्य दानव भूत प्रेत डर से भाग जातें है ।  इनके पूजा करने से भक्त को अग्नि जल शत्रु रात्रि एवं जंतु से कभी भय नहीं होता । माता ग्रहगोचर को भी दूर भगाती हैं । इनके पूजा करते समय यम  नियम  संयम का पालन करना चाहिए । इनकी पूजा में तन और मन की पवित्रता रखना आवश्यक है तभी हमारा जीवन सफल और शुभकारी बन जाता हैं ।

8 महागौरी  (Mahagauri)

महागौरी का यह आठवां स्वरुप बहुत ही शीतल और सौम्य है। इनका वर्ण गौर है , इनका स्वरुप चन्दन और कुंदन के पुष्प जैसा है । इनका दर्शन पाकर भक्त निहाल हो जातें है । इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गयी है । पुराणों में कहा गया है “अस्त वर्सा भवेद देवी ” । इनका अलंकार वस्त्र सभी कुछ श्वेत होते है , इनकी  सवारी वृषभ है।

नवरात्र की पूजा में अष्टमी दिन महागौरी की पूजा का बड़ा ही महत्वपूर्ण विधान है। इस दिन इनके भक्त गण कुमारी कन्या का पूजन करते है , जगह जगह हवन किया जाता है और बहुत से उपासक माँ की प्रसन्न करने के लिए उपवास भी करते है
माँ अपनी पार्वती रूप में शिव की प्राप्त करने की लिए यह प्रण किया था की चाहे मुझे जितने जन्म तपस्या में लग जाएँ लेकिन में पति के रूप में सिर्फ शिव को ही वरन करुँगी भले ही में कुंवारी रह जाऊँ। कहते है कठोर तपस्या के कारन इनका शरीर का रंग बिलकुल कला पड़ गया था । शिव ने स्वयं इनको गंगा जल से स्नान कराया , तब इनका गौर वर्ण वापस आया तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा।

महागौरी की पूजा ध्यान साधक के लिए अत्यंत कल्याणकारी और शुभ होता है । साधक जब सच्चे मन से इनके चरणों में ध्यान लगता है तो माँ उसके पथ ले सारे कंटक रुपी विघ्नो का नाश करती है और सत पथ पर ले जातीं है। यह असंभव कार्य को भी संभव कर देती है ।

9 सिद्धिदात्री  (Siddhidatri)

माँ की नवी शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। यह सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली माता है ।  मारर्कण्डेय पुराण के अनुसार – अणिमा, महिमा , गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य , ईशित्व, वशित्व ये आठ सिध्दियां होती है । माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तो और साधको को सभी सिद्धियां प्रदान करती है । देवी पुराण के अनुसार शिव ने भी माँ से ही  सिद्धियां प्राप्त की थी।  देवी की कृपा से ही शिव ने अर्धनारेश्वर का रूप धारण किया था । माँ का वाहन सिंह है और ये कमल पुष्प पर  आशिन होती है । नवरात्र के नवे दिन इनकी पूजा विधि विधान से की जाती है ।
इस दिन माँ के मंदिर में हवन यज्ञ और कुमारी कन्या की पूजा की जाती है । जो साधक पूर्ण विश्वास के साथ अपने अंत ह्रदय से भक्ति के साथ शास्त्रीय विधि के साथ पूजा करते है उनके दुखो का अंत होना निश्चित है । यह नवरात्र के पूजा का अंतिम दिन है । आठों स्वरूपों की उपासना के बाद नोवे दिन की यह पूजा बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस दिन की पूजा में कमल पुष्प चढ़ाना बहुत ही सुबह और मंगलकारी होता है । हवन करना भी अत्यंत आवश्यक है ।
इनकी पूजा करने के बाद भक्त के मन की सभी इच्छित मनोकामना पूर्ण हो जाती है। ऐसे साधक संसार के सभी सुखो का पान करते हुए भी सांसारिक लिप्सा से आसक्त नहीं होते । माता के सानिध्य में रहकर व्यक्ति दिव्य लोक में विचरण करता है और वास्तविक परमानन्द की प्राप्ति करता है ।
नवरात्र के इस अनुष्ठान से मनुस्य ये अवस्य सिख जाता है की अगर माँ को प्राप्त करना है तो माँ की अंदर समां जाना है अर्थात उसीमें अपने आप को समाहित हो जाना है। माँ हमारा केवल निश्छल प्रेम और अडिग विश्वास पाना चाहती है। इसी प्रेम को पाने के लिए वह अपनी दसो भुजाओ से हमें सब कुछ देने को आतुर है।

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