Munshi Premchand Biography in Hindi – मुंशी प्रेमचंद की जीवनी

Munshi Premchand Biography in Hindi – मुंशी प्रेमचंद की जीवनी

 

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) हिंदी साहित्य के चार स्तंभों में से एक हैं। इनके बिना हिंदी साहित्य की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के लमही गांव में हुआ था। इनका परिवार आर्थिक रुप से बहुत ही कमजोर था। संघर्षमय जीवन बिताते हुए इन्होंने जो हिंदी साहित्य में योगदान दिया है वह अक्षय है। इसलिए इन्हें गुदड़ी का लाल भी कहा जाता है। इनकी रूचि हिंदी और उर्दू में रही, इसलिए इनका लेखन क्षेत्र भी इन दोनों भाषाओं में ही रहा। इनका असली नाम धनपतराय था। पहले अपना लेखन कार्य का प्रकाशन धनपत राय के नाम से ही करते थे। लेकिन सोजे वतन रचना के बाद जब अंग्रेजों ने उन्हें धमकी देनी शुरू कर दी तो उन्हें अपना नाम बदलकर प्रेमचंद रखना पड़ा। इसके बाद ये इसी नाम से वह अपने साहित्य का प्रकाशन करने लगे । बंगाल के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने इनको उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था।

नाम -मुंशी प्रेमचंद (असली नाम धनपतराय )
जन्म- 31 जुलाई 1880
जन्म स्थान- उत्तर प्रदेश, वाराणसी, लमही गांव
पिता- अजायब राय
माता- आनंदी देवी
पत्नी- शिवरानी देवी
मृत्यु- 8 अक्टूबर 1936

प्रारंभिक जीवन- प्रेमचंद का असली नाम धनपतराय था। इनका जन्म उत्तर प्रदेश में वाराणसी के से लगभग 3-4 किलोमीटर दूर लमही गांव में हुआ था। इनकी जन्म तिथि 31 जुलाई 1880 थी। इनके पिता का नाम अजायब राय और माता का नाम आनंदी देवी था। इनके पिता लमाहि गांव के पोस्ट ओफिस में डाकिया का काम करते थे। पिता का बहुत कम पगार होने के कारण इनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। जब इनकी उम्र 7 या 8 वर्ष की होगी तो इनकी माता का देहांत हो गया। जिससे यह बुरी तरह टूट गए।पिताजी का तबादला गोरखपुर हो गया वहीं पर उन्होंने दूसरी शादी कर ली। पर इनकी सौतेली मां ने इनको कभी अपना प्यार नहीं दिया और ना ही कभी इन्हें अपनाया। पिताजी की ओर से भी इनको उपेक्षा ही मिला। माना जाता है कि उनका पूरा जीवन संघर्ष से भरा था। ना तो इन्हें मां का स्नेह मिला और ना ही पिता का प्यार।

शादी- प्रेमचंद के पिता जी ने इनकी शादी बहुत छोटी उम्र में ही बिना उनकी मर्जी से कर दी। उनकी पत्नी ना तो सूरत में थी और ना ही सीरत में, अगर उसके पास कुछ था तो वह थी लंबी और कड़वी जवान। इनसे उम्र में भी वहां बड़ी थी। प्रेमचंद स्वयं बहुत ही हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति थे। लेकिन पत्नी के कड़वे स्वभाव के कारण इनके जीवन में अशांति आ गई। उनके पिता ने पैसे वाले की बेटी देखकर इनकी शादी कर दी थी। इसका अफसोस इनके पिता को बाद में हुआ।

विवाह के एक साल बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गई और इनके सिर पर पूरे परिवार का बोझ आ गया। सौतेली मां, उसके दो बच्चे और अपने खुद पति पत्नी। इस तरह 5 लोगों का परिवार चलाना आसान नहीं था। उन्होंने अपने परिवार को चलाने के लिए अपनी किताबें भी कई बार बेच दी । एक बार तो उन्होंने अपना जवाहर कोट भी बेच दिया। इन बातों से यह अंदाजा लगता है कि उनकी घर की स्थिति जो होगी सो होगी लेकिन उनकी मानसिक विषमताएं कितनी बढ़ गई होगी। इसी बीच में उनकी पत्नी छोड़ कर अपने मायके चली गई।फिर उनका तलाक होगया ।

कुछ दिनों के बाद में उन्होंने अपनी पसंद से दूसरी शादी कर ली। इनका नाम शिवरानी देवी था। जो बाल विधवा थी। इनका यह विवाह बहुत ही अच्छा रहा। इनकी पत्नी बहुत अच्छे स्वभाव की थी और इनके हर दुख सुख में खड़ी रहती थी। मौके पर अच्छा सलाह भी देती थी और इनके काम करने में भी सहयोग प्रदान करती थी। इस दौरान इनकी तरक्की भी अच्छी हुई। इनसे दो बेटा और एक बेटी हुई।

1921 में अपनी पत्नी से विचार विमर्श करके बनारस आकर सरकारी नौकरी छोड़ दी और अपनी रुचि के अनुसार अपने लेखन कार्य पर ध्यान केंद्रित किया। अपने लेखन कार्य में बदलाव के ख्याल से सिनेमा जगत में भी कहानी लिखने की चेष्टा की। कुछ फिल्मों के स्क्रिप्ट भी लिखे पर इनमें अधिक सफलता नहीं मिल पाई। फिर वापस बनारस आ गए इस तरह जीवन में उन्होंने अपना प्रयास और मेहनत आखरी सांस तक जारी रखा।

शिक्षा– उनकी प्रारंभिक शिक्षा मदरसे से हुआ था। वहां पर उन्होंने उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी की भी थोड़ी बहुत शिक्षा ली थी। 1898 में अपने गांव से ही इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और इसके बाद एक स्कूल में शिक्षक बन गए। नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। 1910 में इंटर पास किया और 1919 में बीए पास करके शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त हुए।

साहित्यिक रुचि- प्रेमचंद (Munshi Premchand)  को साहित्य में बचपन से ही दिलचस्पी थी। उन्होंने अपनी पहली कहानी 13 साल की उम्र में लिखी थी जिसका नाम “सौत” था। इनकी परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों ना हो पर उनका साहित्यिक रुझान कभी कम नहीं हो पाया। इन्होंने कम उम्र में ही बड़े बड़े लेखकों के उपन्यास पढ़ लिए थे। मुंशी प्रेमचंद ने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरूर मोलमाशार, रतन नाथ सरशार आदि के उपन्यास पढ़ने लगे थे।वे तो उनके उपन्यास के दीवाने हो गए थे ।

व्यक्तित्व- इनके व्यक्तित्व के संबंध में यह कहना सर्वथा उचित होगा कि “सादा जीवन उच्च विचार करते हर गरीब से प्यार।” बड़े ही दयालु और संवेदनशील व्यक्ति थे। उनका पूरा जीवन कटुता, विषमता, संघर्ष और गरीबी से भरा था। लेकिन इन्होंने इसके आगे कभी हार नहीं मानी। अपनी जिंदगी को एक खेल की तरह लीया। एक बार उन्होंने अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा था- जीवन एक खेल है।अपने हर खेल में सफलता के लिए जी तोड़ मेहनत करो। इतना मेहनत करो कि उसमें हार की बू ना रहने पाए। इस पर भी अगर हार गए तो अपने कपड़े झाड़ कर फिर से खड़े हो जाओ और ताल ठोक कर बाजी जीतने की तैयारी करो। माना जाता है कि यह मजाकिया किस्म के व्यक्ति थे। बाहर से साधारण दिखने वाला इंसान अंदर से बहुत ही जीवट थे । यह उच्च कोटि के मानव थे जिन्हें आडंबर और दिखावा तनिक भी पसंद नहीं था।

ईश्वर के प्रति विश्वास- हम ऐसा नहीं कह सकते की उन्हें ईश्वर के प्रति तनिक भी विश्वास नहीं था लेकिन उनकी परिस्थितियों ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया था कि अपने अंतिम समय में वह कहते थे कि ईश्वर को मैं अब और ज्यादा कष्ट नहीं देना चाहता।

प्रेमचंद की कृतियां– प्रेमचंद की कृतियों का बखान करना सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है। ये एक विद्वान संपादक, संवेदनशील लेखक, एक अच्छे नागरिक और कुशल वक्ता थे। प्रेमचंद ने साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। इन्होंने कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, संपादकीय संस्मरण, उपन्यास,निबंध बहुत कुछ लिखेहैं । इन्होंने करीब 15 उपन्यास लिखे।

कुछ महत्वपूर्ण उपन्यास के नाम हैं इसप्रकार हैं –

प्रेम- 1907 में प्रकाशित हुआ
सेवासदन- 1918 में
प्रेमाश्रम- 1921
रंगभूमि- 1925
कायाकल्प- 1926
निर्मला- 1927
गबन – 1931
कर्मभूमि -1932
गोदान -1936(गोदान का हिंदी साहित्य में ही नहीं विश्व साहित्य में भी स्थान है ।)

प्रेमचंद की कहानी- इनकी कहानी में निम्न और मध्यम वर्ग की झलक मिलता है। इन्होंने करीब-करीब 301 कहानियां लिखे हैं ।यहां पर कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का नाम बताया गया है जो इस प्रकार है-

सोजे वतन, कफन, ईदगाह, पंच-परमेश्वर, दो बैलों की जोड़ी, बड़े भाई साहब, पूस की रात, ठाकुर का कुआं, सद्गति, बूढ़ी काकी, दूध का दाम, मंत्र इत्यादि

नाटक- संग्राम, कर्बला, प्रेम की बेदी

इनके द्वारा लिखित कहानियों पर फिल्म– प्रेमचंद अपनी लेखन शक्ति के द्वारा काफी ऊंचाई पर पहुंचना चाहते थे। इसलिए वे अनेक प्रकार का प्रयास और प्रयोग करते थे ।अपनी कला की कसौटी के लिए मुंबई गए और फिल्म के लिए अनेक कहानियां लिखी। हलाकि इनको इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिली। उनके मरणोपरांत इनकी कई कहानियों पर फिल्म बनाए गए। कुछ इसप्रकार हैं-
सत्यजीत राय ने इनकी दो कहानियों पर यादगार फिल्में बनाईं –
शतरंज के खिलाड़ी- 1977 में, सद्गति 1981 में
मरणोपरांत- सेवासदन 1938 में, कफन 1977 में ( तेलुगु भाषा में ) गोदान 1963 में, गवन1966 में, 1980 में निर्मला टीवी पर एक लोकप्रिय धारावाहिक |

मृत्यु –जीवन के अंतिम समय में प्रेम चन्द बहुत बीमार रहने लगे। लेकिन इस अंतिम क्षण में भी उन्होंने अपनी लेखनी को विराम नहीं दिया। लगातार कार्यशील रहे। हिंदी और उर्दू को मिलाने का अथक प्रयास करते रहे। अंतिम समय में इनके पेट में अल्सर हो गया था जिससे उन्हें अत्यंत पीड़ा होती थी। इनकी पाचन शक्ति बहुत कमजोर हो गई थी। अंत समय तक भी इनका संघर्ष चलता रहा और 8 अक्टूबर 1936 में हिंदी साहित्य के एक महान सम्राट चिरनिद्रा में सो गए। इनकी मृत्यु बनारस में हुई। ऐसे महान साहित्यकार जिन्होंने अपनी लेखनी से कभी ना बुझाने वाला दीपक जलाकर अमर हो गए।

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