Maharishi Valmiki Story in Hindi – महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिचय

Maharishi Valmiki Story – महर्षि वाल्मीकि

पहले वाल्मीकि (Maharishi Valmiki) एक कुख्यात डाकू थे।उस समय इनका नाम रत्नाकर डाकू था। इनका जन्म केवट परिवार में हुआ था। गलत लोगों की संगति में पड़कर ये डकैती का काम करने लगे थे। घोर जंगल में जाने वाले रास्ते पर हथियार लेकर छुप कर खड़े रहते थे। लोगों से मारपीट कर उनका सारा सामान ले लेते थे। जरूरत पड़ती तो लोगों को मार भी डालते थे। उनका जीवन इसी तौर-तरीके से चल रहा था।

Maharishi Valmiki Story in Hindi

एक दिन उसी वन से होकर नारदजी गुजर रहे थे। बाल्मीकि ने उन्हें भी पकड़ लिया और कहा तुम्हारी खैरियत इसी में है कि तुम अपनी सारी संपत्ति मेरे हवाले कर दो। नारद ने कहा मेरे पास तो भगवान का दिया अकूत धन है। मैं तुम्हें एक शर्त पर दे सकता हूं। बाल्मीकि ने बोला, शीघ्र बताओ तुम्हारा क्या शर्त है। नारद जी ने कहा तुम यह सब काम किसके लिए करते हो? बाल्मीकि ने कहा अपने परिवार के लिए करता हूं।उन्होंने कहा तुम अपने घर जाओ और अपने परिवार के सदस्यों से पूछ कर आओ की क्या तुम्हारा इस कुकृत्य के भागीदार होंगे? उसने कहा मुझे बहलाओ मत। मैं जब तक घर जाऊंगा तुम भाग जाओगे। क्या मैं तुम्हें इतना मूर्ख दिखाई देता हूं। इतना कह कर वह नारद को मारने दौड़े। नारद जी ने कहा अच्छा अच्छा सुनो ! अपनी रस्सी से मुझे इस पेड़ में बांध दो और तब तुम अपने घर पूछने जाओ। यह तो ठीक है ना। रत्नाकर डाकू ने कहा ठीक है। नारद जी को रत्नाकर ने रस्सी से एक पेड़ में बांध दिया और घर जाकर अपने माता- पिता,पत्नी सब से पूछा कि तुम सबों का भरण- पोषण करने के लिए मैं जो पाप कर रहा हूं क्या तुम सब लोग इस के भागीदार होंगे? सबने एक ही उत्तर दिया, हम इस पाप का भागीदार क्यों होंगे? हमारा भरण- पोषण करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम कैसे भी करो। इससे हमें क्या मतलब है। यह सुनकर वाल्मीकि स्तब्ध हो गए और उन्हें अत्यधिक धक्का लगा। वह दुखी मन से जंगल नारद जी के पास वापस आए और उनके पैरों पर गिर कर रोने लगे। कहने लगे, हे देव आप मुझे सही मार्ग बताएं। आज से मैं यह कुकृत्य करना छोड़ दूंगा। आज से मैं डाका डालना छोड़ दूंगा। नारद जी ने समझाया, कहा हे वत्स ईश्वर का नाम लेने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने वाल्मीकि को राम नाम का मंत्र दिया पर वाल्मीकि को यह मंत्र उच्चारण करते नहीं बन रहा था ।तब नारद जी ने उन्हें मरा-मरा कहने को कहा और फिर स्वयं वहां से चले आए।

इस नाम का निरंतर जाप करने से रत्नाकर डाकू के जीवन में अद्भुत परिवर्तन आया ।ये रत्नाकर डाकू से वाल्मीकि बन गए । जिस जगह पर उन्होंने जाप करना आरंभ किया वर्षों तक उसी तरह जाप करते रहे। इनके शरीर के चारों तरफ दीमकों ने अपना घर बना लीया। दीमक के घर को ही वाल्मीकि कहते हैं। इसलिए तब से इनका नाम वाल्मीकि पड़ गया। ब्रह्मा जी ने स्वयं आकर इन्हें ऋषि होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा जी ने इन्हें यह भी आशीर्वाद दिया कि उन्हें राम के दर्शन होंगे।

इसके बाद वाल्मीकि ऋषि तमसा नदी के किनारे आश्रम बनाकर रहने लगे। एक बार आश्रम के पास क्रौंच नाम के पक्षियों का एक जोड़ा बिहार कर रहे थे। तभी एक शिकारी ने नर क्रौंच को मार दिया। इसे देखकर वाल्मीकि बहुत दुखी और द्रवित हो गए। उसको शाप देने के लिए अनायास उनके मुख से एक संस्कृत का श्लोक निकल पड़ा। उस समय तक इस संसार में कोई भी कवि ना हुआ था। पहला श्लोक महर्षि वाल्मीकि के मुख से ही निकला। इसलिए इन्हें आदिकवि कहते हैं ।

वाल्मीकि ने श्री राम के चरित्र का वर्णन संस्कृत में बड़े ही सुंदर ढंग से किया है। इसलिए इसे वाल्मीकि रामायण भी कहते हैं। बाल्मीकि रामायण का मनन और चिंतन से हम सब का जीवन आज भी सर्वश्रेष्ठ बन सकता है। वाल्मीकि के जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। हम चाहे तो अपनी दृढ संकल्प शक्ति से अपने जीवन को सर्वश्रेष्ठ बना सकते हैं।एक महान मानव की संज्ञा चरितार्थ कर सकते हैं जैसा कि रत्नाकर डाकू ने महर्षि वाल्मीकि का पद पा कर किया ।

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