Kabir Das Ke Dohe in Hindi – कबीर के दोहे अर्थ सहित

Kabir Das Ke Dohe in Hindi – कबीर के दोहे अर्थ सहित

भक्ति काल के दौर में अनेक महान कवि थे जिन्होंने भारत की मिट्टी को अपनी लेखनी और अमृतवाणी से सींचा है । उसमें सूरदास, मीराबाई, रहीम, रसखान, गुरुनानक, तुलसी इत्यादि आते हैं। इन सबों में संत कबीर दास के दोहे (Kabir Das Ke Dohe) अलग ही स्थान रखते हैं। ये ऐसे एक मात्र कवि हैं जिन्होंने अपने दोहों के माध्यम से समाज की बुराइयां और आडंबरों पर प्रत्यक्ष रुप से कुठाराघात किया है। इनकी भाषा इतनी प्रखर और तेजोमय है कि सदियों बीत जाने के बाद भी जब हम इनके दोहे पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है मानो आज के लिए भी वह उतना ही सत्य है जितना की कल के लिए था।

कबीर जी (Kabir Das) को अपने गुरु रामानंद से मुलाकात बड़ी अजीबोगरीब स्थिति में हुई। वे आधी रात गए गंगा तट की सीढ़ियों पर गुरु को पाने के लिए लेट गए। जब रामानंद जी गंगा स्नान के लिए आ रहे थे तो उनका पैर कबीर के सिर के ऊपर पड़ गया। तभी संत रामानंद जी ने अपने मुंह से उच्चारण किया राम-राम । संत कबीर ने तब से ही रामानंद जी को अपना गुरु और राम नाम को मंत्र के रूप में ग्रहण किया। कबीरदास के जन्म और मृत्यु के बारे में किसी को भी ठीक-ठीक कुछ पता नहीं है । इतना सच जरूर है कि इन्हें हिंदू और मुस्लिम सभी स्वीकार करते हैं। यह एक ऐसे महान संत फकीर है जो किसी देश सीमा से नहीं बंधे है। वे इन सब से ऊपर उठ चुके थे। ऐसे महान संत को हमारा शत- शत नमन है !!

मैं यहां पर आपके लिए कबीर के कुछ महत्वपूर्ण दोहे (Kabir Das Ke Dohe) उनके अर्थ के साथ प्रस्तुत कर रही हूं। आशा करती हूं कि आप सबों के लिए यह बहुत ही लाभकारी होगा। इसे ज़रूर पढ़ें ,अपना feed back भी ज़रूर दें ।

Kabir Das Ke Dohe – कबीर के दोहे और हिंदी अर्थ

1) बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर

अर्थ – प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर दास जी कहते हैं की खजूर के पेड़ की तरह बड़ा होने से कोई लाभ नहीं है । इससे न तो किसी को छाया मिलता है और नहीं सरलता से इसका फल मिलता है। कबीर कहना चाहते हैं की बड़े होने से तभी फायदा है जब हम किसी के काम आ सकें । अगर हम किसी के काम न आ सके तो हमारा बड़ा होना व्यर्थ है ।

2) माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर
कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर


अर्थ
– इन पंक्तियों में कबीर दास जी उन व्यक्तियों पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं जो दुनिया को दिखने के लिए तो सारा दिन माला फेरते रहते हैं लेकिन उनका मन ईश्वर में नहीं होता बल्कि वे सिर्फ सांसारिक बातों में लिप्त रहते हैं। इसलिए कबीर दास ऐसे लोगो से कहते हैं की हाथ की माला छोड़ कर अपने मन को पहले शांत और शुद्ध करो । कबीर कहते हैं की हाथ की माला फेरते -फेरते युगों बित गए पर मन की कालिमा न मिटी, पहले मन को साफ कर लो ।

3) दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोई
जो सुख में सुमिरन करे दुख काहे को होय


अर्थ
– कबीर की ये पंक्तियाँ हम सबों को इंगित करती है । वे कहते हैं मानव के ऊपर जब मुसीबत आती है तभी वह ईश्वर को सच्चे हृदय से पुकारता है लेकिन सुख की घड़ियों में वह उन्हें भूल जाता है । कबीर कहते हैं कि मनुष्य अगर सुख में भी ईश्वर को याद करे तो दुःख कभी नहीं आएगा ।

4) साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय
मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाए


अर्थ
– प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु ! आप मुझे इतना सामर्थ्यवान बनाएं कि मैं अपना और अपने परिवार जनों का अच्छे से भरण -पोषण कर सकूं और साधु संत कि भी सेवा कर सकूं । हमारे दरवाजे से कोई भी भूखा न जाए ।

5) धीरे- धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा रितु आए फल होय

 


अर्थ
-उपर्युक्त पंक्तियों में कबीर दास जी कहते हैं कि हे मानव ! धीर रखो , तुम्हारे सारे कार्य होगें लेकिन समय के पहले कुछ भी होना संभव नहीं है । उचित समय आने पर ही फल मिलता है । जिस प्रकार माली प्रतिदिन बगीचे में पानी पटाता है लेकिन मौसम आने पर ही फल पैदा होता है ।

6) माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूगीं तोय

 

अर्थ – मिट्टी कुम्हार से कहती है आज तेरा वक्त है कि तू मुझे अपने पैरों के नीचे रौंद रहा है एक दिन मेरा आएगा कि तू मेरे नीचे होगा और मैं तेरे ऊपर । इन पंक्तियों से कबीर यह बताना चाहते हैं कि कभी किसी को तंग न करो । जब उसका मौका आएगा तो फिर वह तुम्हे भी नहीं छोड़ेगा ।

7) बोली एक अनमोल है जो कोई बोलत जानि
हिए तराजू तौलिए तब मुख बाहर आनी

 

अर्थ – कबीर दास कहते हैं कि बोली का इस संसार में बहुत महत्त्व होता है । यह एक ऐसी कला है जिसे सब लोग नहीं जानते । मनुष्य को कुछ बोलने से पहले अच्छी तरह विचार करके ही किसी को बोलना चाहिए । बिना सोच विचार कर बोलना अपनी अहमियत खोना है।

8) जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का पड़ा रहने दो म्यान

 


अर्थ
– कबीर दास का कहना है कि विद्वान् और साधु- संत की जाति नहीं पूछनी चाहिए । इनके गुण अनमोल हैं सिर्फ इन्हे अपनाएं । जिस प्रकार

तलवार का उपयोग है उसके म्यान का नहीं ।

9) सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप
जाके हृदय साच है ताके ह्रदय आप

 


अर्थ
– कबीर कहते हैं सच बोलने के बराबर कोई तप नहीं है और झूठ बोलने के बराबर कोई पाप नहीं है । जो हमेशा सत्य बोलते हैं उनके हृदय में ईश्वर का वास होता है ।

10 ) दोष परायी देख के चलत हसन्त हसन्त
अपनों याद न आवही जाको आदि न अंत

 


अर्थ
– कबीर कहते हैं कि जब हम दूसरों का दोष देखते हैं तो हमें बड़ी हंसी आती है जबकि हमारे अंदर ही इतने दोष हैं जिनका आदि अंत नहीं है । कबीर कहना चाहते हैं कि दुसरे के दोष को देख कर कभी नहीं हँसना चाहिए । हमारे खुद में ही अनंत दोष हैं ।

11) जिन ढूंढा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ
मैं बपुरा बूडन डरा रहा किनारे बैठ

 

अर्थ – कबीर दास जी कहते हैं जो लोग परिश्रमी और साहसी होते हैं उन्हें सफलता ज़रूर मिलती है । जीवन में कुछ पाने के लिए बार -बार प्रयास करना पड़ता है। परेशानी झेलनी पड़ती है ,तभी कुछ हाथ लगता है ।जो लोग असफल होने के डर से प्रयास ही नहीं करते उन्हें जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होता है ।

12) सोना सज्जन साधु जन टूटे जुड़ें सौ बार
दुर्जनकुंभ कुम्हार के एक ही धका दरार

 

अर्थ – इन पंक्तियों में कबीर जी सज्जन और दुर्जन व्यक्ति के स्वभाव में अंतर बताते हुए कहते हैं कि सज्जन लोग सोने के समान होते हैं । सोने का सामान टूट जाने पर दोबारा बन जाता है उसी प्रकार सज्जन पुरुष भी रूठ जाने पर दोबारा मान जाते हैं लेकिन दुष्ट लोग मिटटी के बर्तन के समान होते हैं जिसमें एक ठोकर से ही वह टूट जाता है ,बिखर जाता है ।

13) जैसे तिल में तेल है ज्यों चकमक में आग
तेरा साईं तुझ में है तू जाग सके तो जाग

 

अर्थ – कबीर ईश्वर के मर्म को समझते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार तिल में ही तेल व्याप्त होता है उसी प्रकार ईश्वर भी हर मानव के अंदर ही होता है । ईश्वर को पाने के लिए आपको कहीं जाने कि आवश्यकता नहीं है बल्कि सच्चे लगन कि ज़रूरत है । ईश्वर कि हर कृति का सम्मान ही ईश्वर प्रेम है ।

14) बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय
जो दिल ढूंढा आपनो मुझसे बुरा न कोय

 

अर्थ – कबीर कहते हैं कि एक बार मैं बुरे लोगों को ढूंढने निकला लेकिन मुझे कोई भी बुरा व्यक्ति न मिला , फिर मैंने अपने अंदर झाँक कर देखा तो मुझ जैसा बुरा और कोई न था । इस दोहे से कबीर यह समझाना चाहते हैं कि अगर हर कोई अपनी बुराई खुद समझ कर दूर कर ले तो संसार में बुराई नहीं रहेगी । एक दुसरे कि बुराई देखने कि बजाय खुद कि बुराई देखना ज्यादा बेहतर है ।

15) साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाव
सार सार को गहि रहे थोथा देई उड़ाय

 

अर्थ – कबीर दास कहते हैं कि साधु अर्थात सज्जन पुरुष का स्वभाव सूप कि तरह होता है । जिस प्रकार सूप गन्दी चीज़ों को बाहर फेंक देता है उसी प्रकार सज्जन लोग भी लोगों कि बुराईयां बाहर ही छोड़ देते हैं और सूप कि तरह अच्छी चीज़ों को अपने पास रख लेते हैं ।

16) सात समुद्र की मसि करुँ लेखन सब वनराय
सब धरती कागद करूं गुरु गुण लिखा न जाए

 

अर्थ – इन पंक्तियों में कबीर दास जी गुरु कि महिमा बताते हुए कहते हैं कि अगर मैं सातों समुद्र कि स्याही (INK) बनाऊं ,सारे जंगल की लकड़ियों से लेखनी बना लूँ और सारी धरती की कागज़ बना लूँ तो भी गुरु के गुणों की बखान नहीं की जा सकती। सच्चे गुरु ईश्वर के सामान होते हैं ,उनके गुणों की तुलना संसार की किसी वस्तु से नहीं की जा सकती है ।

17) नहाए धोए क्या हुआ जो मन मैल न जाए
मीन सदा जल में रहे धोय बास न जाए

 

अर्थ – नहाने -धोने से कुछ फायदा नहीं होता , अगर आपका मन साफ़ नहीं है । कबीर कहते हैं अगर ऐसा होता तो मछली तो दिन रात जल में ही रहती है फिर भी उससे से गन्दी बास आती है । अतः सच्ची सुगंध के लिए स्नान की नहीं मन का कड़वाहट दूर होना आवश्यक है ।

18) कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढे बन माही
ज्यों घट घट राम है दुनिया देखें नाही

 

अर्थ – कबीर कहते हैं कि ईश्वर तो सर्वव्यापी है । वह तो कण -कण में निवास करता है । ईश्वर हम सब में निवास करता है । उसे देखने के लिए हमारे पवित्र नैन और समझने कि लिए पवित्र मन होना चाहिए लेकिन मनुष्य उसे पाने के लिए इधर -उधर भटकता रहता है । जिस प्रकार मृग के कुंडली में ही कस्तूरी होती है फिर भी उसकी खुशबू पाने के लिए वह इधर -उधर भगति फिरती है |

19) बंदे तू कर बंदगी तौ पावे दीदार
औसर मानुष जन्म का बहुरि न बारंबार


अर्थ
– कबीर कहते हैं हे मानव ! मनुष्य का जन्म बार -बार नहीं मिलता । इस देह का लाभ उठाओ । ईश्वर और गुरु कि सच्चे हृदय से भक्ति करो तभी तुम्हारा यह जन्म सार्थक होगा ।

20) काल करे सो आज कर आज करे सो अब
पल में प्रलय होएगी बहुरि करेगा कब

 

 

अर्थ – इन पंक्तियों में कबीर दास जी आलसी लोगों को समझाते हुए जागरूक करने कि कोशिश करते हैं । कबीर कहते हैं कि हे अकर्मण्य पुरुष ! जागो , समय के महत्त्व को समझो । जो काम कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो । क्या पता अगले पल प्रलय आ जाए और हमारे सारे कार्य अधूरे रह जाएं ।

21) कबीरा जब हम पैदा हुए जग हंसे हम रोए
ऐसी करनी कर चलो हम हंसे जग रोए

 

अर्थ – उपर्युक्त पंक्तियों में कबीर दास जी कर्म की प्रधानता पर जोर देते हुए कहते हैं कि इस संसार में जब हम पैदा होते हैं तो हम रो रहे होते हैं लेकिन संसार हंस रहा होता है । हे मानव ! तुम ऐसा कर्म करो कि जब इस संसार से तुम जाओ तो तुम हंसो पर यह संसार तुम्हारे लिए रोए ।

22) ते दिन गए अकारथ ही संगत भई ना संग
प्रेम बिना पशु जीवन भक्ति बिना भगवंत

 

अर्थ -कबीर कहते हैं जिन लोगों ने न कभी अच्छी संगति की, न कभी अच्छे कार्य किए । उनका सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है। भला ! जिसके मन में दूसरों के प्रति स्नेह न हो , वह पशु नहीं तो और क्या होगा ? कबीर का मानना है कि जिनके हृदय में प्रेम होता है वही श्रेष्ठ पुरुष होते हैं और उन्हें ही ईश्वर की अनुकम्पा मिलती है ; बाकी सारे पशु के समान अज्ञानी और संवेदनहीन होते हैं

23) काकड़ पाथर जोड़ के मस्जिद लिए बनाए
ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाई

 

अर्थ -उपर्युक्त पंक्तियों में कबीर जी धर्म पर आक्षेप करते हुए कहते हैं की लोगों ने कंकड़ पत्थर जोड़ कर मस्जिद बना लिया और उसके ऊपर लाउडस्पीकर लगा कर जोर जोर से अल्लाह को याद करते हैं । ये आडम्बर है । कहने का तात्पर्य यह है कि अल्लाह तो सब के मन में होते हैं ,वे तो न कहे भी सब जानते हैं ,उन्हें दिल से पुकारो वे हमेशा तुम्हारे पास हैं ।

24) कांचे भांडे से रहे ज्यों कुम्हार का नेह
भीतर से रक्षा करें बाहर चोई देह

 

अर्थ -इन पंक्तियों में कबीर दास जी गुरु और शिष्य के संबंध के बारे में बता रहे हैं । वे कहते हैं कि गुरु अपने शिष्य की अंदर से वैसे ही रक्षा करते हैं जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी के बर्तन को आकार देते समय अपने हाथो का सहारा देता है ।जिस प्रकारकुम्हार बर्तन को अच्छा बनाने के लिए उसे चोट देता है उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों को डांटते हैं और उन्हें योग्य बनाते हैं ।

25) ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोए
औरन को शीतल करें आपहुँ शीतल होय

 

अर्थ – कबीर कहते हैं कि लोगों से ऐसी बात कहनी चाहिए जो कर्ण प्रिय हों । कड़वे वचन और कठोर वचन बोलकर किसी का दिल न दुखाएं ।
बाणी ऐसी होनी चाहिए जो खुद के लिए भी सुखद हो और औरों के लिए भी सुखद हो ।

26) निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छबाए
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय

 

अर्थ -कबीर कहते हैं जो आपकी निंदा करते हैं वे भी आपकी भलाई कर रहे हैं । उनके द्वारा ही आपको अपनी कमियों का एहसास होता है।
कबीर कहते हैं निंदा किए जाने पर आप अधैर्य न हो , ये आपके स्वभाव को और भी निर्मल बना देगा ।

27) मार्ग चले जो गिरे ताको नाहीं दोष
यह कबीरा बैठा रहे तो सिर करड कोष

 

अर्थ – कबीर कहते हैं प्रयास करते समय गिर पड़ना अर्थात असफल हो जाना कोई दोष नहीं है और नाहीं कोई बड़ी बात है । लेकिन बिना प्रयास किए हाथ पर हाथ दे कर बैठना बहुत ही गलत है ।

28) ऊंचे कुल में जामिया करनी ऊंच ना होए
स्वर्ण कलश सुरा भरी साधु निंदा होए

 


अर्थ
– कबीर दास जी कहते हैं कि ऊंचे कुल में या कुलीन परिवार में जन्म लेने से कोई बड़ा नहीं हो जाता है । कर्म करने से ही व्यक्ति बड़ा बनता है । अच्छे कुल में जन्म लेने के बाद भी अगर कर्म अच्छा नहीं किया तो वह उसी तरह त्यागने योग्य होता है जैसे सोने के कलश में भरा सुरा ।

29) मांगन मरण समान है मत कोई मांगो भीख
मांगन से मरन भला यह सतगुरु की सीख

 


अर्थ
– कबीर दास जी इन पंक्तियों में कहते हैं कि किसी से मांगना मरने के बराबर है । जीवन में ऐसे व्यक्ति से कुछ भी न माँगो जो रहते हुए भी न कह दे । ऐसे व्यक्ति से कुछ मांगना मरने के बराबर है ।

30) ऊंचे पानी न टीके नीचे ही ठहराय
नीचा हो सो भरि पिए ऊंचा प्यासा जाए

 


अर्थ
– कबीर दास जी कहते हैं जिस प्रकार पानी कभी ऊपर, ऊंचाई पर नहीं रुकता ,नीचे आ कर ही फैलता है । उसी प्रकार जो झुकता है वही जीवन में सब कुछ पता है । कबीर कहते हैं अहंकारी लोगों को कुछ नहीं मिलता, विनम्रता ही मानव को सब कुछ देता है ।

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