How Brahma and Vishnu was Born – ब्र्ह्मा और विष्णु की उत्पत्ति कैसे हुई

एक बार शिव और पार्वती आनंद वन (काशी) भ्रमण के लिए गये यह स्थान अत्यंत सुंदर है| शिव (Shiva) और पार्वती (Parvati) आपस में बात करने लगे की हमारे पास एक ऐसा महान व्यक्ति हो जो सभी विधाओ मैं निपुण हो और जिसपर हम संपूर्ण संसार का भार छोड़ सकते हो| फिर दोनो ने अपनी बाई और देखा तो एक अत्यंत रूपवान कलावान बुद्धिवान व्यक्ति पीला वस्त्र धारण किए हुए प्रकट हुए| उन्ही का नाम विष्णु ( Vishnu ) रखा गया | इस प्रकार शिव ने उन्हे कई नामो से पुकारा जैसे हरी, चतुर्भुज, अच्युत इत्यादि| उन्होने कहा की तुम संसार का पालन करता होंगे और अपने भक्तो का मनोरथ पूरा करोगे| शिव ने विष्णु को योग विद्धया का ज्ञान दिया| उन्होने विष्णु को कठिन  तपस्या का आदेश दिया | विष्णु ने कठिन तपस्या आरंभ की पर कोई विशेष लाभ नहीं हुआ| आकाशवाणी हुई की इतनी आसानी से मैं किसी को नहीं मिलता | कठोर तप करो फिर विष्णु ने अपने हाथों से  गड्ढा खोदा और कठिन तपस्या करके अपने पसीने से हर दिया और फिर पचास सौ बरसो तक इस पुष्कारणी में इतना अधिक्क ध्यान मग्न हो गये की पूरा काशी पसीने के जल से भर गया और इसी समय इनका नाम हर नारायण पड़ गया । इस अवस्था में नारायण मूर्च्छित हो गए थे, ऐसा लग रहा था मानो निद्रा में निमग्न हो । इनके शरीर से इतना पसीना निकला की पूरी काशी डूबने लगी थी, काशी की बचाने के लिए शिव ने इसे अपने त्रिशूल पर उठा लिया ।

How Brahma and Vishnu was Born

 विष्णु जी की नाभि से जो की तलब के समान गहरी और चौड़ी थी शिव ने एक कमल उत्पन्न किया, यह कमल नाल बहुत ही  लंबी थी | यह कमल करोड़ो सूर्यों के समान प्रकाशवान था| उसके बाद उन्होने अपनी दाईं भुजा से ब्रह्मा (Brahma) को उत्पन्न किया| उन्हे इसी कमल मैं बैठा दिया, इनका रंग लाल था| फिर आकाशवाणी हुई की तुम्हारा नाम अज ब्रह्मा (Brahma) विधाता इत्यादि नाम है और तुम संसार की सृष्टि करोगे, इस प्रकार ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई|

ब्रह्मा को अपनी उत्पत्ति पर बहुत आश्चर्य हुआ और इसका पता लगाने के लिए कमल नाल के भीतर चले गये और सैंकड़ो साल पानी में रहकर पता लगाने की कोशिश की, पर कुछ ना पता चल सका| बाहर आने पर उनकी मुलाकात विष्णु से हुई, जो रेवा नदी तट पर बहुत से देव और ऋषिमुनि के साथ बैठे थे| उन लोगो ने ब्रह्मा से पूछा हे प्रभु इस संसार का परम पिता कौन है ?

ब्रह्म और विष्णु मैं श्रेष्ठ कौन ?

 

ब्रह्मा ये सुनते हो बोले हे देवताओ और मुनिओ, मैं ही तीनो लोको का स्वामी हूँ, यह सुनकर विष्णु अत्यंत क्रुध हो गये और कहा की तुम तो मेरे नाभि कमल से उत्पन्न हुए हो तो भला तुम कैसे परब्रह्म हो सकते हो, मैं तुम्हारा स्वामी हूँ और तुम मेरे आधीन हो| दोनो को वेद और प्रणव(ओम) ने बहुत समझाया की भगवान शिव ही एक मात्र परब्रह्म है, दूसरा और कोई नही| शिव ही नाश-रहित निर्दोष है| ये अजन्मा निरगुन और संपूर्ण सृष्टि के मालिक है, पर इन दोनो ने प्रणव और वेद दोनो को ही यह बोल कर चुप करा दिया की तुम्हारा कथन सत्य नहीं है, तभी इन दोनो के बीच में एक परम प्रकाश अपना विस्तार लिए हुए प्रकट हुई, इस की रोशनी इतनी तेज थी की पृथ्वी से आकाश तक इसका दिव्या प्रकाश फैला हुआ था| ये दोनो देखकर डर गये और ये रोशनी शिवलिंग में परिवर्तित हो गया| शिवलिंग का ओर छोर कुछ भी पता नहीं चल रहा था | ब्रह्मा और विष्णु को ये तो पता चल चुका था की उन दोनो से ऊपर कोई और शक्ति है| इसी का पता लगाने के किए विष्णु ने ब्रह्मा से कहा मैं नीचे की और जाकर पता लगाता हूँ और तुम ऊपर जाकर पता लगाओ| हम दोनो में से जो पहले स्पर्श करके के आएगा वोही परब्रह्म माना जाएगा| विष्णु शूकर का रूप धारण करके लिंग के निचले भाग छूने के लिए चल पड़े और ब्रह्मा हंस के रूप धारण करके ऊपर की और उड़े | दोनो ने अथक प्रयास किया लेकिन लिंग का आदि और अंत का पता ना चल सका | ब्रह्मा को उदास देखकर केतकी पुष्प ने उनसे पूछा, ब्रह्मा ने सारा वृतांत कह सुनाया | केतकी ने सलाह दी की तुम अपने साथ विष्णु के पास ले कर चलो , मैं यह गवाही दूँगी की तुमने लिंग के ऊपरी भाग को स्पर्श कर लिया है| सुरभि गाय भी इसमें अपनी सहमति मिलाई| इस प्रकार केतकी पुष्प और सुरभि गाय को लेकर ब्रह्मा विष्णु के पास पहुँचे और कहा की मैने लिंग के ऊपरी भाग को छू लिया है, अगर मेरी बात पर विश्वास ना हो तो इन दोनो से पूछ ले| केतकी और सुरभि दोनो ने कहा की ब्रहमा जी जो कह रहे है वो शत प्रतिशत सही है| केतकी और सुरभि की बात सुनकर शिवजी अत्यंत क्रोधित होआकर प्रकट हुए और कहा तुम लोग झूठ बोल रहे हो | उन्होने केतकी की शाप देते हुए कहा की आज से तुम शिव पूजन पर नहीं चढ़ाई जाओगी| सुरभि को भी शाप देते हुए कहा की जिस मुख से तुमने झूठ बोला है तुम कलयुग में विष्ट खाओगी|
 शिवजी की इस वाणी से ब्रह्मा और विष्णु भयभीत हो कर अपनी आँखें बंद कर ली और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे| हे प्रभु आप हमारे ग़लती को सेवक जानकार क्षमा करे|

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