न जाने की कब बच्चे बड़े हो जायें – Hindi Poem

Hindi Poem
न जाने कब ये पल खो जायें
न जाने की कब बच्चे बड़े हो जायें
 मैं झिड़कती ही रह जाऊं
वो सब कुछ झिड़क कर
घर से निकल जायें
आज झिड़कती हूँ की
रखो सारा सामान तरतीब से
कल तरसूं की काश आकर वो
सब कुछ बिखेर जाए
ये करो ये ना  करो
आज देती हूँ हिदायत
कल सोचूं जो करो सो करो

बस ज़ोर से मेरे गले लग जाओ

फिर क्यों न उन्हें आज ही
जी लेने दूँ जिंदगी
दिल शायद फिर से जीना सीख जाय
मैं भी बन जाऊं बच्चा अपने बच्चों के साथ
इससे पहले की वो बड़े हो जायें

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