Hindi Poem on Shivratri – शिवरात्रि पर कविता

Hindi Poem on Shivratri – शिवरात्रि पर कविता

1  चलो शिवरात्रि मनायें

चलो सखियाँ शिवरात्रि मनायें
शिव पूजन की थाली सजाये
चन्दन रोली अक्षत पुष्प
बेल पत्र भांग धतूरा साथ में लाये
चारों तरफ धूम मची है
शिव ब्याह की शहनाई बजी है
रात्रि जागरण का प्रयोजन है
चलो सब जन उसका साक्षी हो जाएं
शंकर भोले भाले है
भक्तो के निराले है
मस्तक पर त्रिपुण्ड शोभता
चंद्रशेखर कहलाते है
पार्वती इनके बामे अंग विराजती
अशोकसुन्दरी इनकी सुता कहलाती
नहुष इनके जमाता शोभते
कार्तिक गणेश सूत कहलाते
आज अहो भाग्य हमारे है
सृष्टि के रूप निराले है
पंचाक्षरी मंत्र के आज जाप का

महत्व बड़े निराले है

 2 शिवरात्रि – तेरे डमरू से ॐ तरंग निकले

शिव तेरी जटाओ से गंग निकले
तेरे डमरू से ॐ तरंग निकले
तेरा आसन मृग का छाला है
तेरा मन मोहक रूप नीराला है
तेरी भुजाओ से लाखो भुजंग निकले
तेरे डमरू से ॐ तरंग निकले
तुझे महल अटारी न भाता
तू भांग का गोला है खाता
भक्त तुझे जो दिल से पुकारे
तू उसकी झोली भर देता है
शिव भूत प्रेत के संग निकले

तेरे डमरू से ॐ तरंग निकले

शिव सृष्टि के विधाता है
पर पार्वती बिन अधूरे है
शुभ घडी शिव रात्रि की आयी है
शिव शक्ति से ब्याहन को निकले
शिव पार्वती के संग निकले
तेरे डमरू से ॐ तरंग निकले

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