Ganga River History in Hindi – Ganga Nadi – गंगा जी की उत्पत्ति कैसे हुई

Ganga River History in Hindi – Ganga Nadi – गंगा जी की उत्पत्ति कैसे हुई

गंगा नदी (Ganga River) को देव तुल्य माना जाता है , नदियां मुख्य रूप से तीन है, गंगा, यमुना और सरस्वती। इन तीनो नदियों से ही अनेक शाखाएँ निकली है लेकिन सभी नदियों मैं सर्वश्रेष्ठ स्थान गंगा का ही है। इस के जल को अमृत कहा जाता था । आज गंगा (Ganga Nadi) की अवस्था बहुत ही गंभीर और दयनीय है। पहले लोग कहते थे की गंगा में डुबकी लगाकर सारे रोग ख़तम  हो जातें है और सारे पाप धुल जातें है । अभी तो गंगा की ऐसी अवस्था है की उसमें में स्नान करने से लोग तरह तरह की रोगो से ग्रस्त हो जातें है ।

Ganga River History

Ganga River History

गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री (Gangotri) है लेकिन गंगा की उत्पत्ति कैसे हुई, गंगा कौन थी और ये पृथ्वी पर कैसी आयी । ये त्रिपथ गामिनी कैसे हुई , इन सभी प्रश्नो का उत्तर निचे वर्णित है ।

हिमवान नामक एक पर्वत है जो सभी पर्वतो के राजा है और इनमे देवत्व के सभी गुण विद्ध्यमान है । इनके अंदर सभी धातुओं का खज़ाना है । इनके पत्नी का नाम मैना था जो मेरु पर्वत की पुत्री थी। हिमालय और मैना की दो पुत्रिया थी, दोनों पुत्रिया शीलवान, परोपकारी, दयावान, सुन्दर और धैर्यवान थी। इनकी पहली कन्या का नाम गंगा (Ganga) था जिन्हे देव कार्य के सिद्धि के लिए देवताओ ने मांग लिया था और हिमालय ने त्रिभुवन के उपकार के लिए अपनी लोक पावनि पुत्री गंगा को धरम पूर्वक देवताओ को दे दिया ।

हिमवान की दूसरी कन्या उमा (पार्वती) थी। उमा शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए ऐसे उत्कट तपस्या की की इसकी बराबरी तीनो लोको में नहीं हो सकती । कठिन तपस्या के कारन ही इन्हे तपश्चार्णि , ब्रह्मचारिणी इत्यादि कहा गया है । अपने तपस्या के बल पर ही इन्होने शिव को प्राप्त किया। हिमालय के दोनों पुत्रिया अपने अपने स्थान पर सर्वश्रेष्ठता  का पद पा चुकी है। नदियों में श्रेष्ठ गंगा और भगवती में श्रेष्ठ उमा। हिमालय की दोनों पुत्रियों ने अपने पिता को गौरवशाली बना दिया ।

पहले गंगा आकाश मार्ग में गयी , उसके के बाद देव नदी के रूप में देवलोक में गयी और फिर भगीरथ के कठोर तपस्या से जल के रूप में पृथ्वी पर आयी, इस प्रकार वो त्रिपथ गामिनी कहलायी ।

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गंगा पृथ्वी पर कैसे आयी

गंगा जी को पृथ्वी पर लाने की कथा की कड़ी एक लम्बे तार के रूप में जुडी हुई है । अयोध्या में सगर नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था । उसने एक विशाल अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया । इनके 60,000 पुत्र थे और अंशुमान नाम का एक पौत्र था । यज्ञ के बीच में इस घोड़े को इंद्र ने राक्षस का रूप धारण करके घोड़े को चुरा लिया, इसके कारन यज्ञ में विघ्न पड़ गया। उन्होंने अपने 60,000 पुत्रो को अश्व ढ़ूढ़ने को भेजा। उन्हें यज्ञ का घोडा कपिल मुनि के पास मिला तो वह लोग समझे की इन्हीं ने घोडा चुरा लिया है। वे अत्यंत रोष में भर कर बोले तूने ही हमारा घोडा चुरा लिया है। कपिल मुनि अपने आप को अपमानित महसूस करके हुंकार लगायी जिससे 60,000 राजकुमार जल कर वही ढेर हो गए। फिर सगर का पौत्र अंशुमान ढूंढते हुए वहां पंहुचा तो अपने सभी चाचा की मृत्यु देखकर दुखी हो गया और उनका तर्पण करने के लिए जल ढ़ूढ़ने लगा पर जल नहीं मिला। बाद में सगर की भी मृत्यु हो गयी ।

अंशुमन राजा भगीरथ के दादाजी थे , उन्होंने भी अपने पूर्वजो के तर्पण के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने की चेस्टा की थी । इनके पिता दिलीप ने भी अथक प्रयास किया पर भगीरथ के कठोर तपस्या से ही यह असंभव कार्य सफल हो सका । ब्रह्मा ने प्रसन्न हो आकर इन्हे आशीर्वाद दिया और कहा की शिवजी की कठोर तपस्या करों । भगीरथ ने शिवजी की वर्षो तक कठोर तपस्या की, तब शिवजी ने प्रसन्न होकर गंगा की पृथ्वी पर आने के लिए मना लिया । गंगा ने कहा मेरा यह वेग धरती सहन नहीं कर सकती इसलिए हे शंकर आपको मुझे अपनी जटाओ में धारण करना होगा। शिव ने गंगा की यह बात सहस्र स्वीकार कर लिया । अब गंगा सोचने लगी अपने वेग की इतना प्रखर कर दूंगी की शिव को पाताल में ले कर घुस जाउंगी। शिव ने उनकी मनसा को भाप लिया और उनकी अहंकार को तोड़ने के लिए उन्हें अपने जटाओ में ही फंसा दिया । तब गंगा शिव के जटा में उलझ कर रह गयी ।

इधर भगीरथ ने देखा की गंगा अभी तक पृथ्वी पर आयी ही नहीं तब उन्होंने पैर के अंगूठे के बल पर खड़े होकर फिर से तपस्या किया। शिव अत्यंत प्रसन्न हो गंगा को बिंदु सरोवर में ले जाकर छोड़ दिया और वहां से गंगा सात धाराओं में विभाजित हो कर प्रवाहित होने लगी । इस तरह भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजो का तर्पण तो किया ही साथ ही सम्पूर्ण पृथ्वी का कल्याण किया ।

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