Essay on Teachers Day in Hindi – शिक्षक दिवस पर निबंध

Essay on Teachers Day in Hindi – शिक्षक दिवस पर निबंध

शिक्षक (Teachers) का राष्ट्र निर्माण में बहुत बड़ा हाथ होता है। शिक्षक ही राष्ट्र और समाज के कुशल निर्माता होते हैं। एक शिक्षा ना जाने कितने आईएएस, आईपीएस, इंजीनियर, डॉक्टर इत्यादि बना सकते हैं। बच्चों के चरित्र निर्माण में इनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। विद्यार्थी के लिए ये उनके रोल मॉडल होते हैं। बच्चे अपने माता-पिता से ज्यादा शिक्षक की कही बात का अनुकरण करते हैं। बच्चों के लिए शिक्षक के वाक्य अकाट्य होते हैं।

शिक्षक वह नहीं होता जो बच्चों को केवल विषय वस्तु का ज्ञान दें; बल्कि शिक्षक वह होते हैं जो बच्चों को आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करते हैं। उन्हें अपने देश और समाज के प्रति जागरुक करते हैं। आदर्श शिक्षक वह होते हैं जो बच्चों को व्यवहार कुशल और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें अच्छा इंसान बनाते हैं। आज हमारे समाज में नैतिक मूल्यों में अत्यधिक गिरावट आई है । आज इस बात की सख्त जरुरत है कि हम अपने बच्चों को नैतिक ,व्यवहारिक और सामाजिक शिक्षा दें। इस कार्य को करने में एक कुशल शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए शिक्षक को एक कुशल कुंभकार की संज्ञा दी गई है और बच्चों को कच्ची मिट्टी का ।अध्यापक जैसा चाहें अपनी कच्ची मिट्टी को गढ़ सकता है।

शिक्षक दिवस , शिक्षक और विद्यार्थी के बीच मजबूत संबंध बनाते हैं। यह उत्सव 5 सितंबर को हर स्कूल, कॉलेज में मनाया जाता है। यह उत्सव डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan) के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

इस महान नेता का जन्म 5 सितंबर 1888 में चेन्नई से लगभग 50 किलोमीटर दूर तिरुतनी नामक गांव में हुआ था । ये भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे। इसके पहले उन्होंने कई वर्षों तक शिक्षण का कार्य किया था, इसलिए उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत यूनेस्को ने 1994 में की थी।

डॉ राधाकृष्णन बड़े ही कुशाग्र बुद्धि के व्यक्ति थे। उन्होंने मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज से B.A. तथा M.A. की उपाधि ली । इनको अध्यापक बनने की प्रबल इच्छा थी ।उनकी यह इच्छा पूरी हुई। 1909 में वे मद्रास के एक कॉलेज में दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे । बाद में मैसूर और कोलकाता के विश्वविद्यालयों में भी दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में इन्होने कार्य किया।

इसके बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश और काशी विश्वविद्यालय में कुलपति के पद को सुशोभित किया। 1948 से 49 तक यूनेस्को के एक्जीक्यूटिव बोर्ड के अध्यक्ष रहे। 1952 से 62 तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे । 1962 में राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए।

डॉ राधाकृष्णन ने अनेक पुस्तकों की रचना की- द फिलॉसफी ऑफ़ द उपनिषद, हिंदू व्यू ऑफ लाइफ, इंडियन फिलॉसफी इत्यादि। इनकी शिक्षा और साहित्य में गहरी रुचि थी। इन्होने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा एक आदर्श शिक्षक के रूप में बिताया । बिद्यदर्थी इनका बड़ा सम्मान करे थे । भारत सरकार ने इन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया।

शिक्षक दिवस (Teachers day)के दिन कॉलेजों तथा स्कूलों में अच्छी चहल- पहल और उत्साह दिखाई देता है। इस दिन विद्यार्थी इस उत्सव को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं ।उनके लिए और शिक्षक के लिए ये बड़ा ही महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन विद्यार्थी ही शिक्षक की भूमिका निभाते हैं। इससे उन्हें मजा तो आता ही ही है, साथ ही अपने से छोटे बच्चों को पढ़ाते समय उन्हें अपनी जिम्मेदारी का भी एहसास होता है। वैसे विद्यार्थियों के लिए बहुत गौरान्वित और रोमांचित का यह अवसर होता है। विद्यार्थी अपने आप को अध्यापक के रुप में पाकर बहुत खुश होते हैं।

जो बच्चे अपना भविष्य एक शिक्षक के रूप में बनाना चाहते हैं उनके लिए यह अवसर प्रायोगिक दिवस के रूप में होता है । वे इस पद की गरिमा को अच्छी तरह समझने की कोशिश करते हैं।

यद्यपि आज हमारे यहां शिक्षा व्यवसाय का रूप ले लिया है। इसलिए विद्यार्थी और शिक्षकों के व्यवहार में काफी परिवर्तन आ गया है। हमारी शिक्षा पाश्चात्य शिक्षा पद्धति से काफी प्रभावित हुई है जिसके कारण ना तो बच्चे शिक्षक को इतना सम्मान देते हैं और ना शिक्षक को बच्चों से आत्मीयता और अपनापन -सा लगाव होता है।

प्राचीन समय में हमारे यहां बच्चों को गुरुकुल में पढ़ाया जाता था। वहां के नियम और अनुशासन बड़े ही कठिन थे। बच्चों को गुरु के आश्रम में ही रहना पड़ता था। जब तक वह पूर्ण शिक्षा प्राप्त ना कर लेते थे तब तक वह अपने घर वापस नहीं जाते थे। वे अपने साथियों और गुरु माता के साथ ही रहते थे और गुरु माता के हाथों का पका भोजन करते थे। विद्यार्थियों को जमीन पर सोना, सुबह 4:00 बजे उठ जाना, जंगल से लकड़ी लाना, पढ़ाई करना, भिक्षाटन के लिए जाना ये सभी कुछ उनके दिन चर्या में शामिल था।

अब समय बदल चुका है। तकनीकी के समय में आश्रम में रहने की आवश्यकता तो नहीं, लेकिन अनुशासन की आवश्यकता बहुत है। जीवन के समुचित विकास के लिए संयम और अनुशासन की आवश्यकता होती है ।इसकी शिक्षा हमें विद्यार्थी जीवन में ही मिलती है जो हमारे गुरु देते हैं ।

गुरु की ऊर्जा ,शिष्य की किरणें
सूर्य की ऊर्जा सूर्य की किरणें
साथ में मिलते जब दोनों
प्रकाश पुंज खिल जाते हैं
अंबर से धरती तक सब
एक सार हो जाते हैं !!!

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