Essay on Dussehra in Hindi – दशहरा पर निबंध

Essay on Dussehra in Hindi – दशहरा पर निबंध

दशहरा (Dussehra) हिन्दुओं के प्रमुख पर्वों में से एक है। यह पूजा आश्विन मास में शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से प्रारंभ हो कर दशमी तक चलता है। प्रतिपदा को पश्चिम बंगाल में महालया के नाम से जाना जाता है। दशहरा अन्य कई नामों से जाना जाता है । जैसे – नवरात्रि पूजा, विजयदशमी, दुर्गा पूजा इत्यादि। यह पर्व शक्ति का प्रतिक है। इस दिन शास्त्रों की भी पूजा की जाती है । इस पूजा के माध्यम से हम अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं,अपने ऊपर विजय प्राप्त करते हैं। अपने देश और धर्म को सशक्त और समृद्धिशील बनाने के लिए अपने शस्त्रों की पूजा करते हैं और माँ की आराधना कर उसका आशीर्वाद लेते हैं ।

इस पर्व से हमारी अनेक किवदंतियां जुडी हैं । लेकिन सब का आशय एक है – असत्य पर सत्य की विजय , बुराई पर अच्छाई की जीत।

Essay on Dussehra in Hindi

दशहरा का अर्थ है – दस शीश वाला रावण का हार। उत्तर भारत में प्रतिपदा से लेकर नौ दिनों तक माँ दुर्गा की विधि विधान से पूजा होती है । बहुत से लोग अपने घर में भी कलश स्थापना करके सप्तशती दुर्गा का पाठ करते हैं। दशवें दिन गावं में मेला लगता है । रावण का पुतला बना कर जलाया जाता है । कई जगह नाटक मंचन भी होता है । दशमी के दिन हर घर में मिठाई और पकवान बनते हैं। लोग एक दूसरे को उपहार देकर अपनी ख़ुशी का इजहार करते हैं ।

बंगाल में विजयदशमी दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है । सभी माँ दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद चाहते हैं । बंगालियों का ऐसा मानना है की आसुरी शक्तिओं का माँ संहार करके दशमी के दिन कैलाश पर्वत चली जाती हैं । अतः वे लोग दशहरा के दिन दुर्गा की प्रतिमा को बड़े धूम धाम से ढोल बाजे और नाताशे के साथ गली, मुहल्ले बाजार में घुमाते हैं फिर अंत में किसी पवित्र सरोवर या नदी में विसर्जित कर देते हैं । तत्पश्चात अपने मित्रों को बधाई और मिठाई देते हैं । दशमी के दिन बंगाली स्त्रियां आपस में सिन्दूर की होली खेलती हैं ।

विजय दशमी की एक अन्य पौराणिक कथा है की इसी दिन महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ था । विजयदशमी के दिन ही पांडवों का अज्ञातवास की अवधि समाप्त हुई थी।

उत्तर प्रदेश के काशी तथा अयोध्या में नौ दिन रामलीला होता है । यहां का रामलीला पुरे भारत में विख्यात है ।

कुल्लू नगर का दशहरा भी बड़े अनोखे और भव्य रूप से मनाया जाता है । रघुनाथ जी को अट्ठाइस पहियों वाले सजे हुए रथ में बैठाकर ढालपुर मैदान में लाया जाता है प्रातः बेला से ही उनकी पूजा ,आराधना , नृत्य ,लोक गीत का सिलसिला शुरू हो जाता है । स्त्री -पुरुष देवगण को अपने कंधे पर उठा कर पुरे गांव की परिक्रमा करते हैं । दशमी के दिन दोपहर में सभी देवगण रघुनाथ जी के चारो तरफ जोश में परिक्रमा करते हैं । फिर युद्ध के बाजों के साथ लंका पर चढ़ाई की जाती है । व्यास नदी के किनारे काँटों की ढेरों की लंका जलाकर नष्ट कर दी जाती है ।

मैसूर का दशहरा भी काफी प्रसिद्द है । यहां हाथी ,घोडा ,ऊंट पर आधारित भव्य झांकी वाली सवारी निकलती है। इस महीने में खरीफ का फसल काटा जाता है । इसी उपलक्ष्य में फसल और किसान की मस्ती भरी नृत्य की झांकी निकली जाती है ।

उत्तर भारत में बहने अपने भाई को टीका लगाकर नौरतें उनके कान में टांगती हैं। पूजा सम्पन्न होने की ख़ुशी में यह नियम किया जाता है। नौरते माँ का प्रसाद के रूप में माना जाता है। यह हमारी ख़ुशी ,सुख समृद्धि का प्रतिक होता है ,इसलिए इसे अपने घर के पवित्र और महत्त्वपूर्ण स्थान में रखते हैं ।

विजयदशमी धार्मिक दृष्टि से आत्मशुद्धि का पर्व है। यह पर्व हिन्दू संस्कृति की चेतना का प्रतिक है । राष्ट्रीय दृष्टि से सैन्य शक्ति का संवर्धन का दिन है । इस समय हम अपनी आत्मा को आराधना और तप से उन्नत करें । राष्ट्र को शस्त्र और सैन्य से सुदृढ़ करें । यही विजयदशमी का सन्देश है ।

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