Dhruv Tara Story in Hindi – ध्रुव तारा की कथा

Dhruv Tara Story in Hindi – ध्रुव तारा की कथा

ध्रुव (Dhrv) एक अद्भुत बालक थे। उन्होंने अपने बालपन में ही कठिन तपस्या करके विष्णु के साथ साथ शिव जी को भी प्रसन्न कर अपना एक उच्च पद प्राप्त कर लिया था। ईश्वर उनकी भक्ति से इतने प्रसन्न हुए की उन्हें ध्रुव लोक प्रदान किया और वह अपने लोक में ध्रुव तारा (Dhruv tara) के रूप में चमकते है।

ध्रुव परम भाग्यवान हैं। उन्होंने विष्णु जी की कृपा से अत्यंत उच्च पद प्राप्त किया और शिव जी की सेवा करके अपने लोक को निश्चल बनाया।
ध्रुव के पिता का नाम उत्तानपाद था। वे शूर वीर, धर्मात्मा तथा उदार थे। उनकी दो पत्नियां थी- सुरुचि था सुनीति। ध्रुव का जन्म सुनीति के गर्भ से हुआ था। राजा उत्तानपाद अपनी रानी सुरुचि को अधिक प्यार करते थे ।

एक बार जब ध्रुव ने अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा जाहिर की तो सुरुचि ने उसे बड़े कठोर वचन कहे जिससे उनका हृदय बहुत दुखी हो उठा। वह बहुत रोए अपनी मां सुनीति के पास जाकर पूरी कहानी बताई। उनकी मां ने कहा हे पुत्र अगर वास्तव में तुम्हे आनंद प्राप्त करना है तो श्री हरी की तपस्या करो। उनसे बड़ा प्रेम और आनंद देने वाला संसार में कोई नहीं है। माँ की बात सुनकर ध्रुव ने निश्चय किया की वह प्रभु की ऐसी तपस्या करेगा जैसे किसी ने भी ना किया हो। वह ऐसा उच्च पद प्राप्त करेगा जिसे कभी किसी ने प्राप्त ना किया हो।

माता की आज्ञा लेकर ध्रुव तपस्या के लिए निकल पड़े। उस समय उनकी उम्र केवल 5 साल की थी। उनकी इस तपस्या में नारद जी ने बहुत सहायता किया। बालक ध्रुव को अनेक उपदेश दिए, मन्त्र बताये और तपस्या के लिए मार्ग दर्शन किया। इस छोटे से बालक ने मधुवन में जाकर कई वर्षो तक श्री हरी की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या के ज्वाला से तीनो लोक जलने लगे। तब सभी देवताओं ने श्री हरी से कहा के प्रभु ध्रुव को शीघ्र वरदान दे । हम सब उसकी तप के ताप से जल रहे हैं। विष्णु शीघ्र ध्रुव के पास पहुंचे और बोले हे वत्स तुम्हारी तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। तुम काशी में जाकर शिव जी की तपस्या करो और उनसे वरदान मांगो की विष्णु जी ने जो वरदान दिया है वह सत्य और अचल हो जाए।

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विष्णु जी ने ध्रुव को अपने गरुड़ पर बैठाया और काशी लेकर तप करने हेतु चले गए। विष्णु ने सबसे पहले स्वयं विश्वनाथ का पूजा किया। ध्रुव को यह कह कर छोड़ दिया कि तुम शिव का तब तक तप करो जब तक अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर लो । इधर ध्रुव शिव का कठिन तप करने लगा । उसकी तपस्या से शिव प्रसन्न हुए तो ध्रुव के पास आकर उन्होंने वर मांगने को कहा। उसने कहा हे प्रभु! सर्वप्रथम आप मुझे अपना सेवक मानिए। मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखिए। यह सुनकर शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा एवमस्तु। आगे बोलो, तुम्हें क्या चाहिए? ध्रुव ने कहा – हे प्रभु! मैं इतना चाहता हूं कि श्री हरि ने मुझे जो कुछ भी वर दिया है वह सत्य और अचल हो जाए। शिव ने हंसते हुए उसे यह वरदान दे दिए और अंतर्ध्यान हो गए ।
इसके बाद भक्त ध्रुव सबसे पहले अपने पिता उत्तानपाद के पास गए। वहां उनका खूब आदर सत्कार हुआ। उत्तानपाद ध्रुव को राज सिंहासन पर बिठाया। स्वयं वन को चले गए। अंत में ध्रुव को विष्णु जी के गण उन्हें विष्णु विमान में बैठा कर ध्रुव लोक में पहुंचा दिए। यह लोक सभी लोको से ऊपर हैं ।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की अपने दृढ संकल्प ,परिश्रम और ईश्वर की भक्ति से हमारे सरे कार्य सफल हो सकते हैं ।

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