Devotion Knowledge and Detachment – भक्ति ज्ञान और वैराग्य – भक्ति के द्वारा ईश्वर के साथ समन्वय

भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ये तीनों हमारे अंतकरण में होते हैं। भक्ति की सरिता हमारे हृदय में प्रवाहित होते ही हमें ईश्वर से प्रेम हो जाता है । हमारे ज्ञान के अंकुर फूटने लगते हैं ।इस ज्ञान के द्वारा ही हम समझते हैं कि यह संसार क्षणभंगुर है। एक मात्र ईश्वर ही हमारे परम पिता है। फिर वैराग्य की उत्पत्ति होती है। तब हमें सांसारिक चीजों से हमारा लगाव कम हो जाता है। इस संसार में रहते हुए भी हम संसार से विरक्त होते हैं। जिस प्रकार कीचड़ में कमल खिलता है लेकिन वह उसमें व्यापत नहीं होता बल्कि ऊपर रहता है। अपना सारा काम करते हुए भी हम उससे लिप्त नहीं होते ।

प्रश्न उठता है कि कलयुग में भक्ति की स्थिति क्या है? ज्ञान और वैराग्य क्यों कमजोर पड़ गए हैं? इसके पीछे एक बहुत ही अच्छी कहानी है। जिसे मैं आपके सामने व्यक्त कर रही हूं। यह समझने में बहुत आसान होगा ।

एक बार की बात है जब नारदजी पृथ्वी लोक में विचरण करके लौट रहे थे, तो उनकी मुलाकात सनकादिक मुनियों से हो गई। सनकादि मुनि ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। नारदजी बड़े ही व्याकुल और बेचैन थे ,ऐसा जान पड़ता था मानो उनका सब कुछ बर्बाद हो गया हो। उनकी ऐसी अवस्था देखकर सनकादिक मुनि ने आश्चर्य से पूछा- हे मान्यवर! आपकी ऐसी स्थिति क्यों हो रही है? आपको किस बात का दुख है ?अगर आप हम से बताए तो कुछ ना कुछ रास्ता जरूर निकल आएगा। नारद मुनि ने कहा क्या बताऊं मुनिवर, इस कलयुग ने पृथ्वी पर आकर सब कुछ नष्ट कर दिया है। सात्विकता के नाम पर यहां कुछ भी नहीं बचा है। चारों ओर झूठ, पाप, अनाचार, आलस्य, पाखंड इत्यादि का राज्य हो गया है। उन्होंने कहा की जब वे वृन्दावन के यमुना के किनारे पहुंचे तो एक स्त्री बहुत उदास मुद्रा में बैठी थी ।उसके पास दो वृद्ध बीमार अवस्था में लेते हुए थे ।अन्य कुछ स्त्रियां पंखा झेल रहीं थीं ।अपने पुत्रों की ऐसी अवस्था देख कर वह रो रही थी ।यह सारा कुछ देख कर नारद जी ने उस स्त्री के रोने का कारण पूछा।

भक्ति ने नारद जी को देखते ही उन्हें दंडवत प्रणाम किया। कहा कि यह मेरा सौभाग्य है कि आप का दर्शन प्राप्त हुए । ऐसा लगता है कि अब हमारे अच्छे दिन बहुत जल्दी आ जाएंगे और सारी दुश्चिंता हमारी दूर हो जाएगी। नारद ने पूछा, सबसे पहले तुम अपना नाम बताओ और तुम्हारे पास जो वृद्ध पुरुष अस्वस्थ लेटे हैं वे कौन हैं ? ये स्त्रियां जो पंखा झल रही हैं वे कौन है? उसने बताया कि मेरा नाम भक्ति है। यह जो दो वृद्ध पुरुष दिख रहे हैं वे मेरे ही पुत्र हैं। उनका नाम ज्ञान और वैराग्य है ।लेकिन समय के चक्र के कारण यह अत्यंत बीमार और निस्तेज हो गए हैं ।ये स्त्रियां गंगा ,सरस्वती और यमुना इत्यादि हैं। ये नदियां हमारी सेवा करने के लिए आई हैं ।

कुछ-कुछ जगह मुझे सम्मान मिला। लेकिन अधिकांश जगह मुझे उपेक्षा की नजरों से देखा गया। मैं भी अत्यंत ही और दुर्बल हो गई थी लेकिन वृंदावन आने पर मैं फिर से तरुण हो गई हूं। लेकिन मेरे पुत्र अभी भी जर्जर अवस्था में है। कैसी विडंबना है कि मां के सामने पुत्र मूर्छा अवस्था में पड़े हुए हैं। यही सोचती हूं कि मैं तरुण क्यों हुई ?मैं सुंदर क्यों हुई ? मेरे सामने मेरे दोनों बच्चे बूढ़े क्यों ? नारद जी ने भक्ति को समझाते हुए कहा- आप व्याकुल ना हो। श्री कृष्ण जरूर कल्याण करेंगे ।

नारद जी ने कहा- आप मेरी बात ध्यान से सुनिए। अभी कलयुग का प्रवेश हो चुका है। पृथ्वी से जप, तप, योग इत्यादि सत्कर्म समाप्त हो चुके हैं ।सत्पुरुष दुखी रहने लगे हैं और दुष्ट मौज मना रहे हैं। इस समय में बुद्धिमान लोगों को धैर्य रखना चाहिए। हे भक्ति तुम वृंदावन आ गई हो यह अच्छी बात है। तभी तुम्हारा तरुणावस्था वापस आ गया है। तुम्हारे ज्ञान और वैराग्य दोनों पुत्रों को यहां आकर शांति मिली है। जिसके कारण ये सोए हुए जान पड़ते हैं ।यह वास्तव में सोए हुए नहीं बल्कि आराम की अवस्था में है।

भक्ति नारद से कहने लगी पता नहीं राजा परीक्षित ने इस पापी कलयुग को यहां रहने ही क्यों दिया ?नारद ने कहा ऐसा इसलिए कि जिस दिन भगवान कृष्ण इस पृथ्वी को छोड़कर अपने परम धाम चले गए, उसी दिन से कलियुग अपने साजो सामान के साथ इस पृथ्वी पर आ धमका। उसे हटाना विधि के विधान के विरुद्ध था ।

कलियुग में सज्जन मनुष्य को एक लाभ यह है कि हरिकीर्तन से ही उन्हें सब कुछ मिल जाता है ।उन्हें तपस्या या इत्यादि करने की आवश्यकता नहीं होती है। कलयुग के कारण कोई भी धार्मिक कर्म का प्रभाव नहीं पड़ता। ब्राह्मण भी पैसा लेकर ही भागवत की कथा सुनाते हैं। तीर्थ स्थान का प्रभाव भी उतना अधिक नहीं पड़ता। यह सारी बातें सुनकर भक्ति आश्चर्यचकित थी । बार-बार नारद जी को अपने दर्शन देने के लिए धन्यवाद कह रही थी।

नारद जी ने भक्ति से कहा यह भक्ति तुम्हारी उदारता के कारण ही श्रीकृष्ण ने मुक्ति को तुम्हारी दासी के रुप में भेजा है । ज्ञान वैराग्य को पुत्र के रूप में दिया। कलयुग के प्रभाव से तुम्हारे दोनों पुत्र कमजोर भले ही हो गए हैं लेकिन तुम चिंता मत करो उन्हें फिर से नया जीवन देने का मैं प्रयास करता हूं ।नारद ने भक्ति से यह प्रण किया कि जन जन के हृदय में भक्ति बैठा कर ही रहेंगे, तभी वे श्रीहरि का सच्चा भक्त कहलाएंगे ।

उन्होंने कहा जिनके ह्रदय में तुम्हारा निवास होता है उनके जीवन से सभी नकारात्मकता दूर हो जाती है। उनके जीवन में सुख शांति और समृद्धि आती है ।एक मात्र भक्ति ही इस कलयुग में मुक्ति देने वाली है। नारद जी के उत्साहपूर्ण बातों को सुनकर भक्ति के आशा के पंख खिल उठे । नारदजी ज्ञान और वैराग्य उठाने का प्रयास करने लगे। उनके कान के पास वेद ध्वनि और गीता पाठ करने लगे । थोड़ी देर के लिए ही सही लेकिन उन दोनों ने अपनी आंखें खुली और फिर से सो गए ।नारद सोचने लगे इनकी वृद्धावस्था कैसे दूर होगी तभी आकाशवाणी हुई की भक्ति का सर्वत्र प्रसार करने से ज्ञान और वैराग्य की यह स्थिति दूर हो जाएगी ।

नारद जी ने सनकादिक मुनियों से कहा- आप लोग देखने में भले ही बालक लगते हों लेकिन ज्ञान के मामले में महापंडित और महाज्ञानी है ।आप वैकुंठवासी हैं तथा भक्त प्रिय हैं। कृपया करके ज्ञान और वैराग्य किस प्रकार स्वश्थ होंगे इसका रास्ता हमें बताएं ।सनकादि मुनि ने कहा- इसका सबसे सरल मार्ग है श्रीमद् भागवत कथा का प्रचार- प्रसार। नारद मुनि ने कहा तो फिर देर क्यों करना है। हम सब गंगा के तट पर चलें और वहीं पर भागवत कथा का शुभारंभ करेंगे।

इसके बाद नारदजी सनकादिक मुनियों को साथ लेकर गंगा तट पर भागवत कथा का पाठ करने आ गए ।सभी जगह इस कथा का प्रचार प्रसार किया गया। इस कार्य के प्रभाव से सभी ऋषि-मुनि देवी-देवता नदियां, दिशाएं, जंगल , देव, दानव, गंधर्व, मनुष्य प्रकृति में जितनी भी चीजें हैं या जितने भी अंग है सभी यहां इकट्ठे हो गए। सब ने भक्ति के साथ कथा सुनी। जिससे चारों ओर पुष्पवर्षा हुई और जय जयकार होने लगा। इसके श्रवण मात्र से भक्ति के साथ-साथ ज्ञान और वैराग्य धीरे-धीरे स्वस्थ और सुंदर हो गए। नारद ने भक्ति से कहा हे भक्ति तुम अपने भक्तों के हृदय में निवास करो । कलयुग अपना प्रभाव संसार पर तो डाल सकता है पर तुम पर और तुम्हारे भक्तों पर कभी कुदृष्टि नहीं डाल सकता। क्योंकि भक्ति का संबंध हृदय से होता है और ज्ञान और वैराग्य उसकी आत्मा बन जाते हैं ।

दोस्तों कहने का तातपर्य यह है की हमारी भक्ति ही हमें अपने परमपिता का दर्शन करा सकती है । उसके लिए कठोर तप की आवश्यकता नहीं बल्कि सच्चे हृदय से उनसे प्रेम करने की आवश्यकता है, भक्ति की जरूरत है ।

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