Andhakasura Story in Hindi – अंधकासुर को शिव ने उसे अपना प्रिय गण के रूप में कैसे स्वीकार किया ?

Andhakasura Story in Hindi – अंधकासुर कौन था और शिव ने उसे अपना प्रिय गण के रूप में कैसे स्वीकार किया ?

अंधकासुर (Andhakadura) दिति और कश्यप मुनि का पुत्र था। एक बार दिति ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कश्यप मुनि की बहुत सेवा की । कश्यप मुनि दिति की सेवा से प्रसन्न होकर उन्होंने यह वरदान दिया कि उसको एक तेजस्वी, बलवान पुत्र की प्राप्ति होगी। लेकिन उसका पुत्र यदि शिव के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा तभी उसका भला होगा। अगर शिव नाराज हो गए तो उसको कोई भी नहीं बचा सकता।

जब अंधकासुर पैदा हुआ तो उसके सहस्त्र सर, सहस्त्र भुजाएं, सहस्त्र आंखें, सहस्त्र पांव, तेजस्वी तथा हृष्ट -पुष्ट हुआ। वह अंधे लोगों की तरह इधर-उधर झुक कर चलता था; इसलिए इसका नाम अंधक पड़ा। जैसे-जैसे अंधकासुर बड़ा होने लगा वैसे वैसे उसके अंदर राक्षसी प्रवृत्ति बढ़ने लगी। वह संसार में बड़ा उत्पात मचाने लगा। उसने देवताओं से समस्त धन-संपत्ति छीन लिया और सभी देवताओं पर अपनी आज्ञा चलाने लगा। वह इंद्र आदि सभी देवताओं को अपना दास समझता था।

Andhakasura Story in Hindi

इंद्र उसके इस अभद्र व्यवहार से दुखी होकर सभी देवताओं के साथ मिलकर कश्यप मुनि के पास गए और उन्होंने कहा कि अंधकासुर के दुर्व्यवहार को रोकें। उन्होंने कहा अंधक सभी देवताओं के साथ बहुत ही बुरा व्यवहार करता है । कश्यप मुनि ने अपने पुत्र अंधक को समझाया कहा, दिति जो राक्षसों की माता है वह हमारी पत्नी है और तुम्हारी माता है ,अदिति देवताओं की माता है, वह भी मेरी पत्नी है । अत: देवता और राक्षस तुम दोनों आपस में मिल कर रहो । दोनों एक दूसरे का शत्रु नहीं पूरक बनो । तभी संसार में शांति होगी । कश्यप मुनि ने अंधकासुर (Andhakasura) से कहा तीनो लोकों पर राज्य करने का विचार त्याग दो ।यह ही तुम्हारे हक़ में होगा ।

इस बात को लेकर दिति ने भी अंधकासुर को समझाया और कहा की इन सब बातों से अपना दिमाग हटा कर शिव की पूजा करने में लगाओ । देवताओं से शत्रुता छोड़ दो । वह अपनी मां की बात मानकर शिव की पूजा करने लगा । शिव उसकी पूजा और तप से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया की तुम्हारी मौत केवल मेरे हाथो ही होगी । अन्य तुम्हें कोई नहीं मार सकता । तुम तीनो लोकों पर राज्य तो कर सकते हो लेकिन अधर्मी हो जाओगे । शिव इतना वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए ।

एक दिन अंधक इंद्र के पास गया। इंद्र उसके साथ अच्छे व्यवहार दिखाने हेतु उसे अपने पास बैठाया और आने का कारण भी पूछा । अंधक ने कहा, मुझे तुम्हारे पास जो भी वस्तु है उसे देखने की बहुत इच्छा है। अंधक ने फिर कहा, वैसे तो मेरे पास सारी धन-संपदा है। तुम्हारे किसी भी चीज से मुझे लालच या लगाव तनिक भी नहीं है। इंद्र उसकी बातों में आ गए। इंद्र ने अपना सारा कुछ दिखाया। ऐरावत हाथी, उच्च श्राव घोड़ा, रत्न, उर्वशी इत्यादि ।जितनी भी उनकी रानियां, पटरानियां, धन-संपदा सभी कुछ उन्होंने दिखा दिया। यह सब देखकर अंधक बहुत ही आश्चर्यचकित हो गया ।अंधक शक्तिशाली तो था ही उसने अपनी शक्ति का प्रयोग करना शुरू कर दिया। वह सब पर काबू करने लगा। देवताओं के द्वारा अस्वीकार करने पर दोनों में युद्ध हुआ। इंद्र अंधक की शक्ति के सामने टिक ना सके। वह वहां से भाग खड़े हुए। अंधक अपनी माता दिति को भी यहां ले आया और बड़े मौज मस्ती के साथ रहने लगा।

अंधक ने पूरे संसार में यह घोषणा कर दी कि अब देवताओं का नहीं राक्षसों का राज्य है । सभी निर्भीक होकर जो मन करे वैसा करो । सभी देवता गण ब्रह्मा के पास गए। उन्होंने उनको बहुत तरह से संतवना दी और फिर सभी देवता मिलकर विष्णु के पास गए। विष्णु ने कहा, हे देवताओं ! आप अंधक की चिंता छोड़ दो । उससे युद्ध मैं करूंगा और उसका बध भी मैं करूंगा । तुम सब चिंता करना छोड़ दो ।

विष्णु के साथ अंधक का कई वर्षों तक घमासान युद्ध हुआ; पर वह किसी भी तरह से नहीं मारा जा सका । विष्णु ने शिव का ध्यान किया तो शिव ने कहा की तुम्हारे हाथों अंधक बिल्कुल भी नहीं मारा जाएगा। यहां तक कि वह मेरे हाथों से तभी मरेगा जब वह ब्राह्मणों और धार्मिक लोगों के साथ अनाचार और अत्याचार करने लगेगा। तुम सिर्फ एक काम करो उसे ऐसे राह पर ले आओ ताकि वह ब्राह्मणों और सज्जन पुरुषों के साथ अभद्र व्यवहार करें ।तभी उसकी मृत्यु संभव है।

तब विष्णु ने अंधक को अपनी ऒर आकर्षित किया और मीठे वचन में बोले हे अंधक तुम तो बड़े बलवान हो । तुम इतने शक्तिशाली हो की तुम शिव की तरह पुरे संसार में विहार कर सकते हो । यह सुन कर वह बहुत खुश हुआ । स्वयं को तीनो लोकों का स्वामी समझने लगा । ब्राह्मणों , धर्मात्माओं इत्यादि को शापित करने लगा । उसका अनाचार दिन -प्रतिदिन बढ़ने लगा ।

इन घोर अत्याचारों को देखकर सभी देवताओं ने नारद से निवेदन किया- हे नारद ! आप हमारी सहायता करें। देवताओं ने कहा कि आप मंदार वन में जाएं वहां शिव जी को अंधक के उत्पातकों के बारे में बताएं। नारद ने देवताओं की विनती स्वीकार की और वह शिवजी के पास मंदार पर्वत अंधक के बारे में बताने पहुंचे । उन्होंने कहा- कि हे नारद ! तुम मंदार पुष्प की माला पहनकर अंधक के पास जाओ। इतना करने से ही देवताओं का काम सुगम हो जाएगा।

नारद मंदार पुष्प की माला पहनकर अंधक के सामने जैसे ही पहुंचे; अंधक मंदार पुष्प की खुशबू से जैसे पागल ही हो गया हो। उसने नारद से पूछा, आपको यह पुष्प कहां मिला। मुझे भी यह चाहिए। नारद ने कहा, यह पुष्पा मंदराचल में वीर काम्यक वन में है । उस वन में केवल यही नहीं उससे भी बड़े, विशाल और खुशबूदार वृक्ष है। इसे चमत्कारिक वृक्ष भी कहा जाता है। पर उसकी रक्षा वहां शिवगन करते हैं।

अभी शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ वही बिहार कर रहे हैं । उनके बिना आज्ञा से वहां कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता। इतना सुनकर अंधक वहां जाने को उद्धृत हो गया । अपने सेनाओं को साथ लेकर वह मंदार पर्वत पहुंच गया और सारे वृक्ष को तहस नहस कर दिया । अपनी शक्ति से मंदार पर्वत के टुकड़े- टुकड़े कर दिए । मंदार पर्वत अपनी यह दुर्दशा देखकर बहुत दुखी हो गया।

शिव ने कहा, तुम चिंता बिल्कुल भी मत करो। तुम्हारे इन्हीं टुकड़ों से तुम्हारे दुश्मनों का नाश होगा। जिसने तुम्हें बर्बाद किया है वही फिर तुम्हें बनाएगा । ऐसा कहकर शिव मंदार पर्वत के टुकड़ों से अंधकासुर के सेना पर फेंकना शुरु किया जिसके कारण उनके सेनाओं के बीच में खलबली मच गई |यह देख अंधकासुर भी घबरा गया और वह शिव से कातर हो प्रार्थना करने लगा। शिव ने अपने त्रिशूल को अंधक पर फेका और उसकी प्रार्थना से प्रसन्न हो अपने गण बना लिया ।

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